16 मई 2026

36.उन दिनों बच्चो की खिलौना कार टीन की होती थी


बच्चों की कल्पना की दुनिया में उन दिनों आज की तरह सुपरमन, बैट्समैन, स्पाइडरमैन नहीं हुआ करते थे, ना ही रिमोट कंट्रोल से चलने वाली कार या ड्रोन जैसे आधुनिक खिलौने । हम लोग हड़प्पा मोहनजोदड़ो के बच्चों की परंपरा में मिट्टी के खिलौनों से खेलते थे और बड़े घर के बच्चों को प्लास्टिक की नन्ही नन्ही कारों और विमानों से खेलता देखकर उनसे रश्क़ करते थे ।

हमसे पहले के बच्चों को तो शायद यह भी नसीब नहीं होता था इसीलिए सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता में बच्चा अपनी माँ से कहता है 

“ ले देती यदि मुझे बाँसुरी तुम दो पैसे वाली,
किसी तरह नीचे हो जाती यह कदम्ब की डाली “ 

अच्छा लगता है यह सोचकर कि उन दिनों बांस की बाँसुरी दो पैसे मे आ जाती थी ।  वैसे ध्यान से देखिए इस कविता में प्रयुक्त यह ‘यदि’ शब्द उस समय के मनुष्य की आर्थिक सीमाओं को ,उनकी विवशता को प्रकट करता है । आज का बच्चा होता तो सीधे सीधे कहता ‘ मम्मी,मुझे बाँसुरी ले दो । ‘वैसे इन दिनों के बच्चे बाँसुरी से खेलते कहाँ हैं , उन्हे तो मोबाईल से खेलना अच्छा लगता है । 

उन दिनों मध्यवर्गीय और निमनवर्गीय घरों के बच्चों को महंगे खिलौने नसीब नहीं होते थे । हाँ आज के प्ले स्कूल यानी उन दिनों के बालमन्दिर मे इस तरह थोड़े बहुत खिलौने मिल जाते थे लेकिन कितने बच्चों को बाल मंदिर की यह सुविधा मिलती थी यह बात अलग है । 

बाबूजी कहते थे “घर हमारे निजी संस्कारों की प्रथम पाठशाला है और सामाजिक संस्कारों की प्रथम पाठशाला है हमारा स्कूल ।“ उन दिनों इस विचार का प्रसार कम था इसलिए प्री प्रायमरी ,किंडरगार्टन या बालमंदिर जैसे संस्थान बहुत कम थे । 

फिर आम जनता की जेब में इतने पैसे ही कहाँ होते थे । बमुश्किल वे बच्चों को सरकारी स्कूल में भेज पाते थे जहाँ खेलने के लिए स्याही की दवात और कलम होती थी, जिससे खेलने की सज़ा होती थी,स्कूल में गुरूजी की बेंत और घर में माँ की डांट ।

फिर मुझे इतना महंगा खिलौना कैसे मिला 

एक बार बाबूजी अपने कॉलेज की ट्रिप लेकर कोलकाता गए वहाँ उन्हे पायडल से चलने वाली टीन की एक छोटी सी मोटर कार पसंद आ गई ।  । उन दिनों जब एक मामूली शिक्षक की तनख्वाह ही दो ढाई सौ रुपये हुआ करती थी उस मोटर की कीमत थी तीस रुपये । उच्च मध्यवर्गीय परिवारों के माँ बाप अधिक से अधिक अपने बच्चों को तीन चक्के वाली छोटी साइकल दिलवा दिया करते थे , ऐसी मोटर कार तो कोई नहीं दिलवाता था ऐसे मे बाबूजी मेरे लिए यह खिलौना लेकर आए उस समय तो मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा लेकिन आज सोचता हूँ तो लगता है बाबूजी ने मेरे लिए वाकई यह बहुत बाद काम किया था ,मेरे लिए तो यह बहुत बड़ी सौगात थी । 
इस कार को पाकर मैं अपने आप को दुनिया का सबसे अमीर बच्चा समझने लगा था । लेकिन मैं जानता था कि मेरे आसपास सब गरीब बच्चे रहते हैं और वे इस तरह की कार ख्वाब मे भी नहीं देख सकते थे इसलिए मैं उन्हे खुशी से यह कार चलाने देता था । मोहल्ले के सारे नन्हे बच्चे ‘ ए चलाने दो ना ‘ की रिक्वेस्ट के साथ कभी मुफ़्त और कभी चॉकलेट या पिपरमिंट की गोली के एवज में इस कार को चलाने का आनंद ले ही लेते थे । एक बार बैतूल से बिन्नू भैया आए तो कुछ समय के लिए कार का मालिकाना हक उन्हे मिल गया ।

मेरी मोटर ज़रा स्पेशल थी । कुछ समय बाद योगेश काले मामा ने उसे खूबसूरती से पेंट कर दिया , दरवाज़े की साइड में एक गोले के भीतर लिखा SJK यानि शरद जगमोहन कोकास और दूसरी ओर ‘शरद ट्रांसपोर्ट’ । उन दिनों इस तरह की मोटर का चलन नहीं था, फिर भंडारा जैसी छोटी जगह में तो यह और भी दुर्लभ वस्तु थी, सो मेरी मोटर भी लोगों के लिये आकर्षण का केन्द्र बन गई थी । काले मामा ने इस कार के साथ मेरी फ़ोटो भी बहुत खींची 
कार में लगा रबर का भोंपू बजाते हुए, पायडल से कार चलते हुए मैं सारे शहर में घूमता था । बच्चे तो बच्चे बड़े भी उसे एक अजूबे की तरह देखा करते थे । सपाट सड़क पर तो यह मोटर अच्छी चलती थी लेकिन चक्के के गड्ढे में पहुँच जाने के बाद उसे उतरकर धक्का देना पड़ता था । हाँ कभी कभी सांड या कोई गाय उसकी खच खच की आवाज़ से आकर्षित होकर शरारत की निगाहों से उसे देखने लगते तब उन्हें भगाने के लिए किसी न किसी को आवाज़ देनी पड़ती थी ।

इस मोटर की सवारी मैंने बस उतने ही दिनों तक की जब तक मेरे पांव छोटे रहे , पांवों की लम्बाई बढ़ते ही मोटर ने मुझे उसमे बैठने से मना कर दिया ।वैसे भी तब तक मेरे छोटे बहन भाई उसका मालिकाना हक़ लेने के लिए तैयार हो चुके थे । आश्चर्य की बात यही कि इतने बरसों में फिर कभी मैंने किसी बच्चे के पास उस तरह की टीन की मोटर कार नहीं देखी । हालांकि अब ऐसी कारें आने लगी हैं लेकिन वे पायडल से नहीं बल्कि बैटरी से या इलेक्ट्रिक से चलती हैं ऐसी ही एक कार का चित्र देखिए 

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