बच्चों के स्कूल में दाखिले के लिए उन दिनों आज के समान माँ बाप का इंटरव्यू नहीं लिया जाता था बल्कि बच्चे से कहा जाता था कि वह अपने दाहिने हाथ को सर के ऊपर से ले जाकर बायाँ कान पकड़कर दिखाए । वैसे तो दाखिले की उम्र पांच-छह साल होती थी लेकिन सारे माँ बाप एक दो साल पहले की जन्मतिथि बताकर बच्चों का दाखिला करवा देते थे । उस समय किंडरगार्टन या प्री प्रायमरी जैसा कोई कांसेप्ट नहीं था फिर भी भंडारा की शिक्षित महिलाओं की एक संस्था ‘महिला समाज’ द्वारा एक ‘बालक मंदिर’ का सञ्चालन किया जा रहा था ।
बाबूजी ने लगभग दो ढाई साल की उम्र में ही मेरा दाखिला इस बालक मंदिर में करवा दिया । उन दिनों भारी भरकम बस्तों से लदे फदे बच्चों को ढोकर स्कूल ले जाने वाले रिक्शों का चलन प्रारम्भ नहीं हुआ था ।
इस बालक मंदिर में श्रवण नामका एक चपरासी था जो मुझे अन्य बच्चों के साथ जोगीतलाव के मैदान के रास्ते से पैदल ही बाल मंदिर ले जाता था । घर से यह बालक मंदिर बमुश्किल आधा किलोमीटर रहा होगा । मैं सभी बच्चों में छोटा था इसलिये श्रवण के कन्धे पर बैठ कर बाल मंदिर जाने की विशेष सुविधा मुझे प्राप्त थी । श्रवण रोज़ सुबह दस बजे आता, कपड़े के झोले में रखा मेरा टिफ़िन बाँह में लटकाता और मुझे बालकमंदिर ले जाता । जी भरकर खेलने कूदने के बाद एक बजे हम लोग टिफिन खोलते थे ।
यह टिफिन बॉक्स पीतल का एक सामान्य सा डिब्बा होता था जिसके ढक्कन में एक गोल कड़ी लगी होती थी । उसमें ऊपर की ओर एक मुड़ी हुई कटोरी रहती थी जो डिब्बे के ऊपरी हिस्से में अटक जाती थी । यह कटोरी सब्ज़ी रखने के काम आती थी, इसके नीचे रोटी रहती थी । बायें हाथ से डिब्बे का निचला हिस्सा पकड़कर, छल्ले में तर्जनी फँसाकर जैसे ही खींचते थे यह डिब्बा खुल जाता था । उस समय स्टेनलेस स्टील प्रचलन में आ चुका था लेकिन भंडारा में पीतल का गृहउद्योग होने के कारण पीतल के बर्तन वहाँ अपेक्षाकृत सस्ते मिलते थे । इन बर्तनों में भीतर से कलई की जाती थी । इस तरह के टिफिन अब चलन में नहीं हैं ।
बालक मंदिर में लंच के समय सब बच्चों को एक कतार में टाट पट्टी पर बैठाया जाता था । बच्चों के सामने स्कूल द्वारा प्रदान की गई छोटी छोटी स्टील की थाली और ग्लास रखे जाते । फिर सब बच्चे खुद या शिक्षिकाओं की सहायता से अपना टिफिन खोलते थे । टिफिन खोलने से पूर्व एक कविता पढ़ी जाती थी जिसकी एक पंक्ति मुझे याद है ... “प्रथम कवळ घेता नाम घ्या श्री हरि चे ...” अर्थात “पहले कौर के साथ ईश्वर का नाम लो ।“ लगभग सभी धर्मों में रोटी को ईश्वर के साथ जोड़ा गया है । इसाईयत में खाने से पहले आज की रोटी प्रदान करने के लिए प्रभु को धन्यवाद दिया जाता है ।
बालक मंदिर का वह पहला ही दिन था । शांता मावशी ने मेरा कड़ी वाला पीतल का डिब्बा खोलकर छोटी सी रोटी और दूध मलाई, शक्कर स्टील की थाली पर रख दी थी । मैंने बाएँ हाथ से रोटी पकड़ी और जैसे ही अपना दाहिना हाथ कौर तोड़ने के लिए रोटी पर रखा शांता मावशी ने कहा “ ऐसे नहीं, एक हाथ से ही कौर तोड़ना है । दूसरा हाथ दूर रखो ।“
यह मेरे लिए किसी चैलेंज से कम नहीं था मैंने बहुत कोशिश की लेकिन मेरी नन्ही उँगलियाँ रोटी पकड़ ही नहीं पा रही थीं । रोटी थी कि किसी अवसर की तरह बार बार हाथ से फिसल जाती । मैं बस रोने ही वाला था कि मावशी ने कहा “रुको, मैं एक तरीका बताती हूँ । दाहिने हाथ की उंगलियों से रोटी पकड़ो और बायें हाथ को कंधे के समानांतर रखो ।“ उन्होंने रोटी पकड़ने में मेरी मदद की ।
“अब बाएँ हाथ की तर्जनी को सामने रखो जैसे कहीं कोई संकेत कर रहे हो । उनका अगला निर्देश था ।“ मैंने वैसा ही किया । फिर उन्होंने कहा “अब इस बाएँ हाथ की तर्जनी को तानो ।“ मैंने उसे तानना शुरू किया “ और जोर से,और जोर से,और जमके ..” वे कहती रहीं और मैं बाएँ हाथ की वह उंगली तानता रहा । आश्चर्य कि रोटी का कौर मेरे दाहिने हाथ में था । यह मनोवैज्ञानिक प्रोसेस थी । इसमें बाएँ हाथ की तर्जनी उंगली को कन्धे के समानांतर रख कर इतनी ज़ोर से ताना जाता था कि दायें हाथ की उंगली व अंगूठे में अपने आप तनाव उत्पन्न होता था और रोटी का कौर टूटकर हाथ में आ जाता था ।
भंडारा का यह बाल मंदिर आज की मोंटेसरी और किंडर गार्टन स्कूल का आद्य रूप था । आज बच्चों को पहले दिन से ही अंग्रेजी के अल्फाबेट सिखाये जाते हैं लेकिन उन दिनों ऐसा कोई आग्रह नहीं था । हिंदी या मराठी की बाराखड़ी सिखाने की बजाय बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर अधिक जोर दिया जाता था । तरह तरह के खेल हम लोगों को सिखाये जाते थे । बस्ता जैसी कोई चीज़ नहीं थी और जो किताबें दी जाती थीं वे बालक मंदिर में ही मिल जाया करती थीं l उनमे चित्रात्मक पुस्तकें सबसे ज़्यादा थीं । गिनती सिखाने के लिए एक एबेकस भी था । ऐसा ही एक एबेकस हमारे घर में भी था जिसमे रंग बिरंगी लकड़ी की सौ गोलियाँ थी, इसे हम लोग ‘गोलीयंत्र’ कहते थे ।
इस बालक मंदिर में शिक्षिकाओं को मिस ,मैडम या टीचर या बहनजी कहने का चलन नहीं था । उन्हें हम लोग ‘मावशी‘ कहते थे । ‘मावशी‘ का अर्थ होता है ‘मौसी’ । वहाँ तीन या चार शिक्षिकाएँ थीं । शांता मावशी इन सब की मुखिया थीं अर्थात प्रमुख शिक्षिका । सभी शिक्षिकाएँ इस बात पर ध्यान देती थीं कि बच्चे अपना काम खुद करना सीखें । खाने से पहले व बाद में साबुन से हाथ धोना, चप्पलें बाहर उतारना, छींकते समय मुँह पर रुमाल रखना, मूत्र विसर्जन के पश्चात पानी डालना जैसे कितने ही काम मैंने वहाँ सीखे । पढ़ाई लिखाई व खेल कूद के बाद खाना होता था और खाने के बाद सबकी छुट्टी हो जाती थी । छुट्टी होते ही श्रवण दादा हमें घर पहुँचा देता था, कभी कभी बाबूजी या माँ भी लेने आ जाते थे ।
उस वक़्त मेरी उम्र बहुत कम थी फिर भी बाल मंदिर जाने में मुझे बहुत आनंद आता था लेकिन पड़ोस के अपने हमउम्र मित्रों को बालमंदिर न जाते हुए देख मुझे अच्छा नहीं लगता था । एक दिन मैंने माँ से पूछा “माँ यह रामकिशन और बुद्ध्या बालक मंदिर क्यों नहीं जाते ?“ माँ कुछ देर चुप रही, फिर उन्होंने कहा …” बेटा उनके माता- पिता ग़रीब हैं ना वे उन्हें बालकमंदिर नहीं भेज सकते ।
‘ग़रीब‘ शब्द से यह मेरा पहला परिचय था । मैंने माँ से पूछा “माँ ग़रीब याने क्या होता है ?” माँ ने मुझे ग़रीब की परिभाषा नहीं बताई लेकिन मेरा आशय समझकर कहा “ बेटा, उनके पास पैसे नहीं हैं ना, बच्चों को बालक मंदिर भेजने के लिए पैसे तो चाहिए।“ मेरी समझ की सीमा यहीं तक थी । हालाँकि यह बात मुझे अजीब सी लगी इसलिए कि वे भी हमारी तरह खाना खाते थे, कपड़े पहनते थे और ख़ुद के घरों में रहते थे जबकि हम लोगों का घर किराए का था फिर वे ग़रीब कैसे हुए । यह बात मुझे बाद में समझ आई कि गरीबी का ताल्लुक घर के मुखिया की आमदनी से होता है । मेरे पिता सरकारी नौकरी में थे, उनकी एक निश्चित आमदनी थी इसलिए वे ग़रीब की श्रेणी में नहीं आते थे । उन बच्चों के माता-पिता मजदूर थे और उनकी कोई निश्चित आमदनी नहीं थी । बच्चों के बालक मंदिर की फीस देना तो दूर कभी कभी उनके घरों में ऐसे भी दिन आते थे जब खाने के लिए भी कुछ नहीं होता था ।
मैंने अपने माँ बाप से कभी ऐसी कोई मूर्खतापूर्ण ज़िद नहीं की कि उन बच्चों को भी मेरी तरह बालमंदिर भेजना चाहिए या जब तक वे मेरे साथ नहीं जायेंगे मैं बालक मंदिर नहीं जाउँगा या उनके माँ बाप को पैसे दे दो ताकि वे भी अपने बच्चों को बालक मंदिर में प्रवेश दिलवा सकें । यह सब बातें बड़े लोगों के बचपन की कथा में घटित होती हैं ।
इन किस्सों को विस्तार से जानने के लिए मेरी किताब बैतूल से भंडारा :एक जन इतिहास अवश्य पढ़ें । पुस्तक ऐमज़ान पर उपलब्ध है इस लिंक पर क्लिक करें और ऑर्डर करें
आपका
शरद कोकास





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