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| हिन्दी प्राथमिक शाला जो अब नहीं है |
पिछली रात मैंने एक सपना देखा
कि दुनिया के सारे लोग एक बस में बैठे हैं
और हिन्दी बोल रहे हैं
फिर वह पीली-सी बस हवा में गायब हो गई
और मेरे पास बच गई सिर्फ मेरी हिन्दी
जो अंतिम सिक्के की तरह
हमेशा बच जाती है मेरे पास
हर मुश्किल में
मेरे बाबूजी श्री जगमोहन कोकास हमेशा के लिए मध्यप्रदेश छोड़कर महाराष्ट्र आ गए थे । उनके पास भी केवल उनकी हिन्दी बच गई थी । हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के अलावा वे प्रयाग से हिन्दी साहित्य रत्न की उपाधि भी प्राप्त कर चुके थे । उनकी कोशिश थी कि उनकी मातृभाषा हिन्दी उनकी अगली पीढ़ी में भी बची रहे इसलिए वे मुझे हिंदी माध्यम की शाला में प्रवेश दिलवाना चाहते थे । मेरे पाँव भी इतने लम्बे हो चुके थे कि अब मैं उन्हें बालक मंदिर की बजाय प्राथमिक शाला की सीढ़ियों पर रख सकता था ।
बाबूजी के अलावा भंडारा में ऐसे अनेक लोग थे जिनके पास उनकी हिन्दी बची हुई थी । मध्यप्रदेश की सीमा से लगे होने के कारण शुरू से ही भंडारा में हिंदी भाषियों की संख्या काफी थी । विभाजन के आसपास पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों के पुनर्वास हेतु नगर के अंतिम छोर पर सिन्धी कॉलोनी भी बसाई गई थी । व्यवसायी वर्ग की सिन्धी,पंजाबी,गुजराती आबादी के अलावा यहाँ दो मोहल्ले मुस्लिम बहुल आबादी के भी थे । इन में बहुसंख्य परिवारों के बच्चे मराठी की बजाय हिन्दी उर्दू माध्यम से ही पढाई कर रहे थे । उस समय भंडारा शहर में नगर परिषद गाँधी विद्यालय एकमात्र ऐसा विद्यालय था जहाँ हिन्दी,मराठी व उर्दू तीनों माध्यमों से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक शिक्षा प्रदान की जाती थी ।
उन दिनों इस तरह होता था एडमिशन
बाबूजी ने मेरा दाखिला हिन्दी प्राथमिक शाला में करवा दिया । उन दिनों जन्म प्रमाणपत्र चलन में नहीं थे । यदि कोई बालक या बालिका दायाँ हाथ सर के ऊपर से घुमाकर बायाँ कान पकड़ ले तो उसे प्रवेश का पात्र मान लिया जाता था । बाबूजी इस शाला में बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज के छात्रों का अभ्यास शिक्षण पाठ देखने जाया करते थे । प्रधान अध्यापक शिवहरे गुरूजी से उनकी अच्छी पहचान थी अतः मुझे यह प्रवेश परीक्षा नहीं देनी पड़ी वर्ना मैं उसमे फेल हो जाता क्योंकि मेरे हाथ कान तक पहुंचते ही नहीं ।
कक्षा में यस सर कह कर हाजरी देने वाले बच्चों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि एक ज़माने में ऐसे स्कूल होते थे जहाँ नाम पुकारने पर ‘जी हाजिर गुरूजी’ कहना पड़ता था । हिन्दी मीडियम के यह गुरूजी चौड़े पायचे वाले पायजामे पहनते थे और खादी का कुरता धारण करते थे । यद्यपि मेरे प्रायमरी स्कूल में दाखिला लेते समय अनेक गुरूजी पायजामा त्यागकर पैंट शर्ट पहनने लगे थे और उन्हें सर कहलाना अच्छा लगने लगा था ।
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| यह पुरानी तस्वीर है अब यह इमारत नहीं है |
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| पानी की टंकी यानी ढोला 1900 मे बना हुआ |
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| यह टंकी उपयोग मे नहीं है लेकिन आज भी खड़ी है 2025 |
ऊपर की मंज़िल मे एक भूत रहता था
यद्यपि यह तिमजली इमारत थी लेकिन हम लोगों को केवल दूसरी मंज़िल तक जाने की इज़ाज़त थी । तीसरी मंज़िल के बारे में कहा जाता था कि वहाँ भूख और ग़रीबी से तंग आकर फांसी लगा लेने वाले किसी शिक्षक का भूत रहता है । मेरी भूत देखने की बहुत इच्छा थी लेकिन मेरा कोई दोस्त मेरे साथ वहाँ जाने के लिये तैयार नहीं होता था । हालाँकि बाद में मैंने अपने जैसे कुछ जिज्ञासु बच्चों के साथ ऊपर जाकर वह मंजिल देख ली थी । पुराने टूटे हुए फर्नीचर के अलावा वहाँ कुछ नहीं था । अंत में सर्वसम्मति से हमने तय किया कि यहाँ कोई भूत नहीं रहता है । बाद में वैज्ञानिक सोच के एक गुरूजी ने बताया कि बच्चे ऊपर न जाएँ और कोई दुर्घटना न घटित हो इसलिए ऐसी अफवाह फैलाई गई थी ।
बालक मंदिर के दिनों में मोहल्ले के किसी मित्र से भूत यह शब्द सुनकर मैंने बाबूजी से पूछा था “बाबूजी, भूत क्या होता है ?” उन्होंने जवाब दिया था कि “भूत-प्रेत,चुड़ैल जैसा कुछ नहीं होता है , यह केवल मन का वहम है, कल्पना है जो किस्से कहानी में होता है ।“ उस दिन के बाद से मेरे मन में भूत का ख़याल कभी नहीं आया ।
यह वह उम्र होती है जिसमें बच्चे तर्क नहीं करते । उनके अवचेतन में जो बात डाल दी जाए वह जीवन भर स्थायी रहती है जब तक कि सायास उसे हटाने का प्रयास न किया जाए । घृणा, प्रेम, अन्धविश्वास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण , जाति, धर्म की अवधारणा सब इसी उम्र में दिमाग में दाखिल होता है । बड़े होने के बाद हमें चयन करना होता है कौनसी बात हमारे लिए सकारात्मक है और कौनसी नकारात्मक ।
ढोला स्कूल की यह इमारत अंग्रेजों द्वारा बनाये गये टाउन हाल का बड़ा रूप थी । अब इस इमारत की जगह पनि कि एक टंकी है जिसका चित्र आप देख सकते हैं । वैसे टाउन हाल की इमारत शहर के बीचों बीच थी जिसमें नगर पालिका का दफ़्तर था । अंग्रेज़ों द्वारा निर्मित एक और शाला भंडारा में थी जिसका नाम लॉर्ड मनरो के नाम पर मनरो स्कूल था, जिसे आज़ादी के काफी सालों बाद बदल कर लालबहादुर शास्त्री विद्यालय कर दिया गया था । यह ईटों से बनी लाल गेरुए रंग की एक इमारत थी ।
अब स्कूल की इमारत की जगह यह पानी की टंकी है
| मनरो हाईस्कूल अब लाल बहादुर शास्त्री विद्यालय |
| जिला ग्रंथालय भंडारा |
| गेट के पीछे यहीं मैदान था जहां अब कमरे बने हैं |
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| इस घर मे रहते थे जैनेन्द्र जितेंद्र |
घटना बहुत छोटी सी थी लेकिन इतना सबक मुझे मिल गया था कि यदि हम अपनी सीमाओं का ध्यान नहीं रखेंगे तो लुढ़ककर कीचड़ में गिर जाने से हमें कोई नहीं बचा सकेगा । यह अनुभव जीवन भर मुझे झूठ,फरेब,धोखे,बेईमानी और अनैतिकता के दलदल में गिरने से बचाता रहा ।
आपका
शरद कोकास
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