26 सितंबर 2016

ईश्वरचंद्र विद्यासागर

जन्मतिथि पर विशेष 

ईश्वर  चन्द्र  विद्यासागर     का नाम आपने सुना होगा  | उनका मूल नाम ईश्वरचंद्र बंदोपाध्याय था  बंगाल के पुनर्जागरण के काल में जिन व्यक्तियों का नाम प्रसिद्ध हुआ उनमे ईश्वरचंद्र का भी नाम था । इनका जन्म 26 सितम्बर 1820 को  पश्चिम बंगाल में हुआ था और करमाटांड़ इनकी कर्मभूमि रही  वे उच्चकोटि के विद्वान थे। उनकी विद्वता के कारण ही उन्हें विद्दासागर की उपाधि दी गई थी ।उन दिनों जब स्त्री का पढ़ना अच्छा नहीं माना जाता था उन्होंने नारी शिक्षा के लिए प्रयास किये जिस तरह नारी शिक्षा के क्षेत्र में महाराष्ट्र में सावित्री बाई फुले का नाम लिया जाता है उसी तरह बंगाल में उन्हें जाना जाता है  वे नारी शिक्षा के समर्थक थे।

हिन्दू समाज में विधवाओं की स्थिति हमेशा से दुखद रही है । उन्होनें विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए जनमत तैयार किया । । उन्होंने जनता को अपने साथ लेकर  विधवा पुनर्विवाह के लिए आंदोलन किया और अठारह सौ छप्पन में इस आशय का अधिनियम पारित कराया । सन अठारह सौ छप्पन से साथ के बीच उन्होंने अनेक विधवाओ का पुनर्विवाह कराया । यही नहीं उन्होंने अपने इकलौते पुत्र का विवाह भी एक विधवा से ही किया । बाल विवाह का भी वे सदा विरोध करते रहे ।

विद्यासागर जी को सुधारक और समाज सेवी के रूप में राजा राममोहन राय का उत्तराधिकारी माना जाता हैं विद्यासागर एक प्रसिद्ध दार्शनिक और समाज सेवी के अलावा शिक्षा विशेषज्ञ , लेखक , प्रकाशक , मुद्रक  और सुधारक थे उनका दृष्टिकोण मानवतावादी था । बांगला भाषा उस समय बहुत कठिन मानी जाती थी सो उन्होंने बांगला भाषा के गद्य को सरल  एवं आधुनिक बनाने का कार्य भी किया । उन्होने बांग्ला लिपि की वर्णमाला को भी सरल एवं तर्कसम्मत बनाया। बांगला के अध्ययन हेतु उन्होंने अनेक  विद्दालय स्थापित किए तथा रात्रि पाठशालाओं में लोगों के पढ़ने की व्यवस्था की। यही नहीं उन्होंने संस्कृत  भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए भी प्रयास किया। उन्होंने संस्कृत कॉलेज में पाश्चात्य चिंतन का अध्ययन भी प्रारंभ करवाया ।विद्यासागर जी का जन्म 26 सितम्बर 1820 को हुआ था उनका निधन 29 जुलाई 1891 में हुआ   

29 अगस्त 2016

मेरे साथ रहती हैं मेरे माता-पिता की अस्थियाँ



देह का अंतिम हश्र यही होता  है 

आज मेरे पिता स्मृतिशेष जगमोहन का स्मृति दिवस है । माता स्मृतिशेष शीला देवी का निधन 8 अगस्त 2001 को हुआ था और पिता का ठीक उनसे  दो वर्ष बाद 28 अगस्त 2003 को । तेरह वर्ष हो गए पिता को गुज़रे हुए । उनके संघर्ष से हमने संस्कार पाए ,उनकी आदतों को हमने अपने भीतर ढाला ,उनकी सामाजिक सेवा और साहित्यानुराग से प्रेरित हुए ।

मैं आत्मा ,मोक्ष , पिंडदान, स्वर्ग-नरक,पुनर्जन्म  किसी में विश्वास नहीं रखता पिता भी नहीं रखते थे । मुझे पता है मरने के बाद आदमी का कुछ भी शेष नहीं रह जाता ,देह भस्म हो जाती है ,ख़ाक हो जाती है । माता- पिता के अग्निसंस्कार के पश्चात उनकी अस्थियाँ नदी में प्रवाहित करते समय मैंने कुछ अस्थियाँ  अपने पास रख ली थीं जो अभी भी मेरे पास हैं । मैं जब भी उन्हें छूता हूँ तो महसूस करता हूँ कि यह कभी उनकी देह में रही होंगी । लोग कहते हैं  ..अस्थियाँ घर में नहीं रखनी चाहिए .. । मैं जानता हूँ देह जब तक जीवित रहती है प्रिय होती है, लेकिन मृत देह को लोग नष्ट कर देते हैं , यह ज़रूरी भी है , आखिर उस रूप में देह नहीं रह सकती हमारे साथ, लेकिन क्षरण होने तक अस्थियाँ तो रह सकती हैं । मुझे तो अगर दुनिया के पहले मनुष्य की अस्थियाँ मिल जाएँ तो मैं उन्हें भी रख लूँ , आखिर वे भी तो हमारे पूर्वज थे ।

पुरातत्व के मेरे गुरु डॉ. वाकणकर जी  कहते थे .. "कंकाल से क्या डरना ,डर तो ज़िन्दा आदमी से होता है , मैं तो तम्बुओं में कई बार कंकालों की बगल में सोया हूँ . ।


आज पिता को याद करते हुए अस्थियों की यह तस्वीर ...

शरद कोकास 

13 जनवरी 2012

सूपा , हंडी और धनुष से बना वाद्य यंत्र - सुमिन बाई का धनकुल


13 वें "रामचन्द्र देशमुख बहुमत सम्मान का आमंत्रण जब बहुमत पत्रिका के सम्पादक विनोद मिश्र जी ने भेजा तो सबसे पहले यह जानने की उत्सुकता हुई कि इस बार यह सम्मान किसे दिया जा रहा है । कार्ड खोलकर देखा तो एक नितांत अपरिचित नाम .. सुमिन बाई बिसेन । मुझे याद ही नहीं आया कि इनका कभी नाम सुना हो । फिर जब सुमिन बाई की विधा पर नज़र डाली तो और भी अधिक आश्चर्य हुआ । सुमिन बाई धनकुल नाम का एक वाद्य का वादन करती है और साथ ही गायन भी करती हैं ।
जब इस वाद्य के बारे में पढ़ा तो और भी अधिक आश्चर्य हुआ । सुमिन बाई चावल फटकने वाले एक सूपे , एक हंडी और एक धनुष को बाँस की किमची से बजाती हैं । इतना पढ़कर उत्सुकता और बढ़ गई और मैं कार्यक्रम की राह देखने लगा ।
आज 12 जनवरी 2012 को सुमिन बाई को यह सम्मान प्रदान किया गया । इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति श्री सच्चिदनन्द जोशी । अध्यक्षता कर रहे थे छत्तीसगढ़ शासन के संसदीय सचिव श्री विजय बघेल । मुख्य वक्तव्य दिया सुप्रसिद्ध पत्रकार और हिन्दी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष श्री रमेश नैयर । आलोचक जयप्रकाश व कलासमीक्षक राजेश गनोदवाले ने धनकुल परम्परा पर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत की ।
इसके बाद वह क्षण आया जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी । बहुत ही सादे वस्त्रों में उपस्थित सुमिन बाई अपने दो सहयोगियों के साथ और अपने वाद्य यंत्र के साथ मंच पर आई । उन्होंने सर्वप्रथम एक हंडी को रखा , उस पर अनाज फटकने का एक सूपा रखा फिर उस पर धनुष की प्रत्यंचा टिका दी । उनके हाथ में बाँस की एक कमची थी । उस कमची को उन्होंने प्रत्यंचा पर रगड़ना शुरु किया और एक अद्भुत ध्वनि उत्पन्न हुई । फिर उन्होंने गायन प्रारम्भ कर दिया ।
तिजा जगार , चारखा गीत , शिव पार्वती प्रसंग ,एक एक कर वे सुनाती गईं और लोग सुनते गये । कई लोग बार बार मंच के पास आकर उनके इस वाद्य यंत्र को देख रहे थे , उन्हे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इतनी मामूली वस्तुओं से भी ऐसी ध्वनि निकल सकती है ।
बाँये से ऋषि गजपाल , शरद कोकास , सुमिन बाई व सहयोगी
जोशी जी ने बताया कि बरसों पहले ऐसे ही एक कलाकार कश्मीर से आया था और उसने अपने वाद्ययंत्र की प्रस्तुति दिल्ली आल इंडिया रेडियो पर देनी चाही थी लेकिन रेडियो वालों ने कहा कि यह वाद्ययंत्र उनके यहाँ लिस्टेड नहीं है सो वे कोई और कार्यक्रम प्रस्तुत करें । वे कलाकार थे पं.शिवकुमार शर्मा और उनका वाद्ययंत्र था सरोद ।
गनीमत है कि इस वाद्ययंत्र को यहाँ पहचाना जा चुका है और सुमिन बाई मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद तथा छत्तीसगढ़ शासन के अनेक कार्यक्रमों में यह प्रतुति दे चुकी हैं ।
लेकिन ऐसी कला को विलुप्त होने में क्या देर लगती है ? आज जहाँ कम्प्यूटर से संगीत उत्पन्न किया जा रहा है वहाँ सूपे , हंडी और धनुष की क्या बिसात ?
जोशी जी का किस्सा सुनते हुए मुझे याद आया ऐसे ही हम लोग हॉस्टेल में जाने क्या क्या बजाया करते थे । एक दिन हमारे सीनियर और वर्तमान में प्रसिद्ध कवि और आलोचक श्री लीलाधर मंडलोई ने हम लोगों का संगीत सुना और वे हमे आकाशवाणी ले गये थे युववाणी में प्रस्तुत करने के लिये । बहरहाल वह किस्सा फिर कभी ।
आज आप धनकुल नामक इस अद्भुत वाद्य का चित्र देखिये और बधाई दीजिये लोक कलाकार सुमिन बाई बिसेन को ।


sharad kokas  

6 अक्तूबर 2011

दशहरे और दिवाली पर जिनका हैप्पी बर्थ डे है

जगमोहन कोकास व शीला कोकास 
     आज मेरे दिवंगत पिता , मेरे बाबूजी  जगमोहन कोकास का जन्मदिन है । बचपन में हम लोग त्योहार मनाते थे और त्योहारों की तरह हमारे जन्मदिन भी मनाये जाते थे । लेकिन माता - पिता को कभी हमने उनका जन्मदिन मनाते नहीं  देखा था । जब पहली बार उनसे पूछा कि " आपका जन्मदिन कब है ? " तो उन्होंने कहा  2 अक्तूबर । " अरे वाह " हम लोग प्रसन्न हो गये थे ।
              मैंने कहा अब अगली बार दो अक्तूबर को आपका जन्मदिन मनायेंगे । वे हँसने लगे ..." अरे भाई , दो अक्तूबर को तो दो बड़े बड़े लोगों का जनमदिन मनाया जाता है , मैं तो एक मामूली सा आदमी हूँ । " उनकी बात सुनकर हम लोग चुप हो गये  । फिर भी मैंने कहा .. " लेकिन दादा दादी तो आपका जनमदिन मनाते होंगे ? " वे बोले " कहाँ का जन्मदिन .. घर में इतने सारे बच्चे थे और इतनी गरीबी थी कि  यह दिन भी अन्य साधारण दिनों की तरह बीतता था । "

     हम भाई बहन , सीमा और बबलू  उनकी यह बात सुनकर उदास हो गये । हमे लगा हम बाबूजी का जनमदिन शायद ही कभी मना सकें । हम  बच्चों को उदास देखकर उन्होंने कहा .. " लेकिन जिस दिन मैं पैदा हुआ था उस दिन दो अक्तूबर के अलावा दशहरा भी था , और दशहरा तो हम सभी लोग मनाते ही हैं । "

      बस फिर क्या था अगली बार से दशहरे में यह भी
 जुड़ गया कि सुबह उठते ही हम लोग सबसे पहले बाबूजी को हैप्पी बर्थ डे कहते थे और शाम को शमी पत्र यानि सोना देकर उनके पाँव छूते थे । शाम को वे हम लोगों को भंडारा में अपनी साइकल पर बिठा कर सीमोलंघन के लिये ले जाते थे , चिचबन मैदान के उस पार , जहाँ दशहरे का मेला लगता था ।
   
             हाँ एक बात और इसी सिलसिले में माँ से भी उनके जन्मदिन के बारे में  पूछा था ... " माँ तुम्हारा जन्म दिन कब आता है ? " माँ मुस्कराई और कहने लगी .. " तुम्हारे बाबूजी का दशहरे के दिन तो मेरा दिवाली के दिन । "
कितने अच्छे दिन हमारे माँ - बाप के जन्मदिन आते थे ।  दोनों का जन्मदिन अलग से मनाने की कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी ।
   

खैर वह सब बातें फिर कभी । आज दशहरे के दिन बाबूजी का पुण्य स्मरण और उनको हैप्पी बर्थ डे । 

21 सितंबर 2011

हैप्पी बर्थ डे टू पाबला जी


इधर पिछले कुछ दिनों से ब्लॉग पर सक्रियता कुछ कम हो गई है । सोच ही रहा था कि लिखने की रेल फिरसे पटरी पर आ जाए कि अचानक फिर ज़रूरी कामों में उलझ गया और लिखना कुछ दिनों के लिए टल गया ।
सितम्बर माह प्रारम्भ होते ही ख्याल आता है कि इस माह में कुछ “ महान “ लोगों का जन्मदिन है । अरे अरे... चौंकिये मत सचमुच ऐसा है । अब सूची प्रस्तुत करूंगा तो बहुत देर हो जाएगी । वैसे सच बात तो यह है कि मुझे महान लोगों का जन्म दिन याद भी नहीं रहता । इतना भर याद रहता है कि इस माह अपने मित्र श्री बी. एस. पाबला जी का जन्म दिन है ।
सितम्बर प्रारम्भ हुआ और धुन सवार हो गई कि हमेशा की तरह पाबला जी के जन्म दिन पर एक पोस्ट लिखनी है । लेकिन वाह री ज़िन्दगी ... परिवार में एक ऐसी घटना घटित हो गई जिसकी वज़ह से बहुत  बुरी तरह व्यस्त हो जाना पड़ा ।
आज सुबह पाबला जी को फोन पर जन्म दिन की बधाई दी और साथ ही क्षमायाचना की ...आज आपके जन्म दिन पर कुछ नहीं लिख पाउंगा ।पाबला जी ने कहा ..” कोई बात नहीं शरद जी , पारिवारिक और सामाजिक ज़िम्मेदारियों का निर्वाह पहले ज़रूरी है । “  
सारे कामों से फुर्सत पाकर अभी लौटा और घड़ी देखी तो अहसास हुआ कि अभी 21 सितम्बर समाप्त होने में कुछ समय बाकी है । सो ब्लॉगर धर्म का निर्वाह किया जा सकता है । अब इसे ब्लॉगर धर्म कह लें या मित्र धर्म ,की बोर्ड पर उंगलियाँ चलने लगीं ।
बहुत कठिन बीता पिछला साल पाबला जी के लिये । मुसीबतें आईं और चली गईं । ज़िन्दगी ने फिर अपनी रफ्तार पकड़ ली । पाबला जी थे जो निभा ले गए ।
इस जन्मदिन पर पूरे ब्लॉग जगत की ओर से उनके लिये शुभकामनायें और पाबला जी के लिये उनकी तबियत के अनुसार किसी शायर का यह एक शेर ..
                    “  नशेमन पर नशेमन इस कदर तामीर करता जा
                       कि बिजलियाँ गिर गिर के खुद बेज़ार हो जाएँ ॥ “

                      पाबला जी को जन्म दिन पर अनंत शुभकामनायें  

2 मार्च 2011

इस उपन्यास को आप खा सकते हैं

          आज कवयित्री व उपन्यास लेखिका पुष्पा तिवारी का जन्मदिन है       

उस दिन सुबह सुबह पुष्पा दीदी का फ़ोन आया … “ शरद शाम को आना है , मेरे उपन्यास ‘ राधेबाबू आनेवाले हैं ‘ का विमोचन है । “ मैंने पूछा … “ कौन आनेवाले हैं ?” 
उन्होंने कहा …” राधेबाबू आनेवाले हैं “ । मैंने फ़िर कहा … “ नहीं दीदी विमोचन करने कौन आनेवाले हैं ? “ दीदी ने ज़ोरदार ठहाका लगाया …” ऐसा कहो ना । अरे कौन आयेगा… विनोद जी आ जाएँगे और बस यहीं के लोग … छोटा सा आयोजन है । “ मैंने कहा … वाह , श्री विनोद कुमार शुक्ल जैसे बड़े कवि और उपन्यासकार आ रहे हैं तो फ़िर और किसकी आवश्यकता है ? कार्यक्रम ज़ोरदार रहेगा इसमें कोई शक नहीं । “ “ अरे तुम आओ तो …” दीदी ने कहा ।
शाम को दीदी के घर पहुंचा तो काफ़ी भीड़भाड़ थी । शहर के तमाम साहित्यकार आए हुए थे , विमोचन हुआ , खाना- पीना हुआ ।समारोह में उपन्यास के अलावा विशेष आकर्षण की वस्तु थी ,केक पर आइसिंग से बनाया हुआ उपन्यास का एक चित्र.। हमने  दीदी की कवितायें भी सुनी …हां यह बता दूँ कि पुष्पा तिवारी मूलत: कवयित्री हैं और उनका एक कविता संग्रह ‘ बिन आहट ‘ आ चुका है । जी हाँ ‘ बिन आहट ‘ यह कविता संग्रह का ही नाम है और यह इसलिये कि पुष्पा दीदी का साहित्य जगत में प्रवेश भी बिन आहट ही हुआ है । इसीलिये इस कविता संग्रह के ब्लर्ब में उनके पति ,लेखक और कानूनविद श्री कनक तिवारी ने अपनी टिप्पणी में लिखा है…”बिन आहट एक कवयित्री ने कविता संसार में कदम रखें हैं । बत्तीस वर्षों के साथ में मैंने कभी यह सोचा भी नहीं था कि पुष्पा में कोई कवि है जिसे तलाशने की भी ज़रूरत होगी । कविता का सहसा जन्मना नदी के उद्गम से निकलने की तरह एक आन्तरिक फ़ेनोमेना है । “
  मुझे लगा उनसे पूछूँ … आपने यह भी नहीं सोचा होगा कि पुष्पा दीदी के भीतर कोई उपन्यासकार भी छुपा है ? “ खैर तब तक पता तो हम लोगों को भी नहीं था कि इतनी अच्छी कवयित्री के साथ साथ वे एक उपन्यासकार भी हैं । वैसे अब तक इस उपन्यास के अलावा उनका एक उपन्यास ‘ नरसू की टुकुन कथा ‘ और आ चुका है और एक कविता संग्रह । कबीर पर एक वैचरिक ग्रंथ के सम्पादन के साथ साथ दुर्ग-भिलाई की बीस कवयित्रियों के कविता संग्रह का सम्पादन भी उनके खाते में है ।
           बहरहाल आज दो मार्च है और कानपुर में जन्मी पुष्पा तिवारी का आज जन्मदिन है । केक का यह चित्र उपन्यास के विमोचन के अवसर का है और इस पर जो चित्र बनाया गया है वह उपन्यास का मुखपृष्ठ है  । …तो आप लोग  केक खाइये , उपन्यास पढिये और पुष्पा तिवारी को जन्म दिन की बधाई दीजिये ।    - आपका शरद कोकास
आईये पड़ोस को अपना विश्व बनायें

6 जनवरी 2011

अगर मेरा नाम शरद विश्वकर्मा होता तो..

विगत दिनों नागपुर जाना हुआ था , छोटी बहन की ननद की बेटी के विवाह में । विवाह समारोह दिन में सम्पन्न हुआ । मंत्र पढ़े गये और  ‘कुर्यात सदा मंगलम...’ की ध्वनि के साथ ममता रिधोरकर व सारंग पेंढारकर एक दूजे के साथ परिणय सूत्र में आबद्ध हो गये । तत्पश्चात भोजन सम्पन्न हुआ , पारम्परिक पकवानों के अलावा बेसन का झुनका और ज्वार की रोटी यानि भाकर भी जम कर खाई गई । भोजनोपरांत वैदिक विवाह पद्धति से भी विवाह सम्पन्न हुआ । कुछ देर पश्चात वर - वधू हाथ में शक्कर से भरी हुई एक कटोरी लेकर आये और सारंग ने चम्मच से शक्कर देते हुए कहा “ मुँह मीठा कीजिये , आज से इसका नाम शमिका हो गया है ।“ मुझे याद आया महाराष्ट्रियन ब्राह्मणों में विवाह के उपरांत एक रस्म होती है जिसमें वधू का मायके का प्रथम नाम बदल दिया जाता है और उसे दूसरा नाम दिया जाता है  । इसके लिये पंडित द्वारा वधू को तीन विकल्प दिये जाते हैं । उसे अपनी पसन्द का एक नाम चुनना होता है ।
चित्रा व राजेन्द्र
मैं शक्कर फाँकते हुए कुछ सोच ही रहा था कि मेरे फुफेरे भाई राजेन्द्र शर्मा की पत्नी चित्रा ने मुझसे सवाल किया “ भैया , क्या यह गलत प्रथा नहीं है कि मायके का दिया हुआ नाम ससुराल में बदल दिया जाए ? “ मैंने कहा “ हाँ गलत तो है , यह स्त्री के अस्तित्व व अस्मिता का सवाल है । मेरे विचार से नाम क्या सर्नेम भी नहीं बदलना चाहिये । “ “ तो फिर आपने भाभी का सर्नेम क्यों बदला ? “ उसने तपाक से सवाल किया ।

शरद विश्वकर्मा ( कोकास ) व लता कोकास 
“ हा हा हा ...” मैं ज़ोरों से हँसा । “ भई , मैं तो उपनाम बदलने के पक्ष में ही नहीं था । विवाह के पश्चात दो वर्षों तक इनका नाम लता विश्वकर्मा ही था । लेकिन होता यह था कि जब भी मैं इनके स्कूल जाता था तो मेरा स्वागत आइये विश्वकर्मा जी कह कर किया जाता । उधर मेरे दोस्तों के बीच इन्हे श्रीमती कोकास कह कर सम्बोधित किया जाता । इस तरह अपनी पहचान को लेकर कई बार विचित्र स्थितियाँ उत्पन्न हो जातीं थीं । अब इस तरह के परम्परावादी समाज में हम दोनों दो - दो नामों के साथ तो नहीं रह सकते थे ना , इसलिये तय किया गया कि एक को तो नाम बदलना ही होगा । अंतत: इनका उपनाम बदल दिया गया ।“
“ वही तो ।“ चित्रा ने फिर सवाल किया । तो भाभीजी ने ही अपना नाम क्यों बदला आपने क्यों नहीं ? “ मैंने कहा .. “ भई, अगर कुछ हज़ार वर्षों पूर्व की मातृसत्तात्मक परिवार की स्थिति होती तो अवश्य ही मैं अपना नाम बदल लेता लेकिन क्या करें हमारे यहाँ पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था है । नाम बदलने से पहले व्यवस्था बदलना ज़रूरी है , और वह इतनी जल्दी तो हो नहीं सकता । “
लेकिन प्रश्न जहाँ का तहाँ है , आखिर स्त्री नाम क्यों बदले ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वह अपने पूर्व नाम और उपनाम के साथ ही अपना अस्तित्व बनाये रखे । वैसे यह सम्भव तो है ,मैंने बहुत सी विदूषी महिलाओं को देखा है जिन्होंने विवाह के उपरांत भी अपने उपनाम नहीं बदले इसलिये कि उनकी पहचान ही पहले के नाम के साथ जुड़ी थी । लेकिन इस तरह होता यह है कि व्यावसायिक क्षेत्र में तो उनका पूर्व नाम ही प्रचलित होता है और सामाजिक क्षेत्र में पति का उपनाम जुड़ जाता है । इस तरह उन्हें दो नामों के साथ जीना पड़ता है । हमारी एक रंगकर्मी व लेखिका मित्र हैं ऊषा वैरागकर , रंगकर्मी श्री अजय आठले से विवाह के पश्चात उन्होंने अपना नाम ऊषा वैरागकर आठले लिखना प्रारम्भ किया और अब वे पूरी तरह ऊषा आठले हो गई हैं । लेकिन पुराने लोग अभी भी उन्हें पुराने नाम से ही जानते हैं । और अपने पूर्व नाम को लेकर संकल्पित हमारी ब्लॉगर मित्र वन्दना अवस्थी दुबे से तो आप परिचित हैं ही ।  
सारंग पेंढारकर व शमिका ( ममता ) पेंढारकर 
                         फिर भी इसका तात्कालिक उपाय तो यही है कि प्रथम नाम तो कम से कम न बदला जाये , लेकिन प्रथायें तो प्रथायें है और हम इनका विरोध भी करते हैं लेकिन जानते हैं व्यावहारिक जगत में इनका हल ढूँढना इतना आसान नहीं है  । इसके लिये नई सोच के युवाओं को ही आगे आना होगा ।  बहरहाल कु. ममता रिधोरकर अब सौभाग्यवती शमिका पेंढारकर हो गई हैं । श्री सारंग पेंढारकर का नाम वही है जो पहले था । उनके नाम के आगे महाराष्ट्र की परम्परा के अनुसार सौ. भी नहीं जोड़ा जा सकता क्योंकि वे पुरुष हैं , हाँलाकि इतनी अच्छी लड़की से विवाह कर सौभाग्यवान तो वे हो ही चुके हैं । फिलहाल इस चर्चा के बहाने हम , दोनों को अपनी शुभकामनायें और बधाई दें और उनके सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करें । 
 
    
आईये पड़ोस को अपना विश्व बनायें

25 दिसंबर 2010

आपने भी कभी बदले होंगे घर

                            
       इस ब्लॉग की डिज़ाइन का निर्माण करते हुए अचानक ख्याल आया कि पास पड़ोस का अर्थ होता है अपना पास पड़ोस यानि कि अपने घर का पास पड़ोस । तो क्यों न हेडर में अपने घर की तस्वीर दी जाए । फ़िर घर का ख्याल आया तो सबसे पहले उस घर की तस्वीर मानस में उभर आई जिसमें मैंने जन्म लिया था और फ़िर उस घर की जहाँ मेरी परवरिश हुई । फ़िर उन सब घरों की याद आई जहाँ रहकर मैंने पढ़ाई की , जहाँ मैं पेइंग गेस्ट रहा , और हॉस्टल के उन कमरों की भी जहाँ मैंने ज़िन्दगी के कुछ साल व्यतीत किये  । फ़िर दुर्ग के अपने इस घर की जहाँ वर्तमान में मेरा बसेरा है  । नौकरी के लिए दुर्ग शहर आया तो यहाँ किराये के एक मकान से अपनी ज़िन्दगी प्रारम्भ की और मकान और बस्तियाँ बदलते हुए अंतत: खुद का एक घर बना लिया । पता नहीं यहाँ का दाना- पानी भी कब तक है ।
ऐसा अनेक लोगों के साथ होता है कि वे जन्म किसी घर में लेते हैं , जीवन किसी और घर में बीतता है और अंत किसी और ही घर में होता है । स्त्रियों के लिये तो शायद यह नियति ही है कि उन्हे माँ- बाप के घर से पति के घर जाना होता है इस तरह दो घर तो उनके स्थायी होते ही हैं । लेकिन  जब भी हम एक घर से दूसरे घर में जाते हैं यह जाना चुपचाप नहीं  होता । न किसी घर को छोड़ते हुए सब कुछ छूटता है , न सब कुछ साथ जाता है ।
अज्ञेय की एक कविता मुझे याद आ रही है ……

विदेश में कमरे


वहाँ विदेशों में
कई बार कई कमरे मैंने छोड़े हैं
जिन में छोड़ते समय
लौटकर देखा है
कि सब कुछ

किराये का मकान छोड़ते हुए गृहणी व कवि का संसार 
ज्यों का त्यों है न ?- यानि
कि कहीं कोई छाप
बची तो नहीं रह गई
जो मेरी है
जिसे कि अगला कमरेदार
ग़ैर समझे …।

इसी तरह जब भी हम किसी नए घर में प्रवेश करते हैं तो ऐसा लगता है वहाँ जीवन भर रहेंगे लेकिन एक दिन आता है जब उस घर को छोड़ना पड़ता है । ज़िन्दगी में कोई मकान स्थायी नहीं होता न कोई पता । अंत में उस मकान में जाना होता है जिसका पता भी हम नहीं जानते । अरे…मैं तो जीवन दर्शन बघारने लगा … लेकिन यह सच है कि कब्र को मकान कहने का ख्याल ऐसे ही किसी दार्शनिक को आया होगा ।
बहरहाल बैतूल के मेरे जन्मगृह से शुरू हुई मेरी यात्रा भंडारा , नागपुर , भोपाल , उज्जैन होते हुए दुर्ग तक आ पहुँची है । इतने शहरों में भी जाने कितने मकानों में रहा हूँ मैं । सोच रहा हूँ उन मकानों के बारे में और उन शहरों के बारे में श्रन्खलाबद्ध रूप से कुछ आलेख लिखे जायें । वैसे इस तरह के मेरे एक- दो आलेख मध्यभारत के अखबार ‘ लोकमत समाचार ‘ में प्रकाशित भी हुए हैं । इस श्रन्खला के लिये बहुत से नाम दिमाग में आ रहे हैं , जैसे...... 


            1 मेरे बसेरे

मेरा जन्मगृह , बैतूल, मध्यप्रदेश
2 जिन घरों में रहा हूँ मैं
3 मेरे आशियाने
4 जहाँ पे सवेरा हो
5 जहाँ मैंने रातें बिताईं
6 मेरे घरौन्दे
7 सर पर छत
8 मेरी ज़िन्दगी के ठिकाने

            आप से मदद की गुजारिश है , इनमें से कोई एक नाम या इनके अलावा भी कोई अच्छा सा नाम मुझे सुझायें । हो सकता है , आगे चलकर यह लेख एक किताब की शक्ल अख़्तियार कर लें , अन्यथा ब्लॉग में तो आप इन्हे पढ़ ही लेंगे और इन मकानों की तस्वीरें भी देख लेंगे । मुझे विश्वास है कि इन घरों, मकानों, हॉस्टल के कमरों के वर्णन के साथ साथ , उस शहर , उस जनपद और उसके पास पड़ोस की संस्कृति , भाषा , जनजीवन के बारे में भी अकादमिक जानकारी से अलग बहुत कुछ आपको जानने को मिलेगा ।
फिलहाल सिर्फ़ एक तस्वीर मध्यप्रदेश के शहर बैतूल के इतवारी बाज़ार स्थित उस घर की जहाँ मेरा जन्म हुआ । इस घर और इस शहर के बारे में पढ़ियेगा अगली पोस्ट में ।
आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी मुझे ।    

15 नवंबर 2010

जसम के राष्ट्रीय सम्मेलन की तीन पन्नों की विस्तृत लिखित रपट

ब्लॉगर ,कवि , रंगकर्मी व पत्रकार राजकुमार सोनी भी उपस्थित थे 

गजानन माधव  मुक्तिबोध

मंच पर गणमान्य अतिथि 


दुर्ग भिलाई में विगत 13 एवं 14 नवम्बर को जन संस्कृति मंच का 12 वाँ राष्ट्रीय सम्मेलन सम्पन्न हुआ । प्रस्तुत है इस सम्मेलन के दूसरे दिन शाम तक की लिखित रपट । इसे पढ़ने के लिये पन्ने पर क्लिक करें ।
पहला पन्ना 
दूसरा पन्ना 
तीसरा पन्ना 

14 नवंबर 2010

सत्ता को आज अपने दुष्कृत्य के लिए कोई ग्लानिबोध नहीं है - मंगलेश डबराल







भिलाई में जन संस्कृति मंच के  बारहवें राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए “मुक्तिबोध व्याख्यान माला” के अन्तर्गत “ सत्ता और संस्कृति “ विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए प्रख्यात कवि और पत्रकार मंगलेश डबराल ने कहा -
* “सत्ता को आज अपने दुष्कृत्य के लिए कोई ग्लानिबोध नहीं है ।
*अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ समझौता कर भारतीय शासक वर्ग सार्वजनिक संसाधनों की लूट में लगा है । *साधारण जन के प्रति सत्ता बिलकुल संवेदनहीन हो चुकी है । आम जन की तकलीफ़ो , विस्थापन , और शोषण उत्पीड़न के लिए ज़िम्मेवार सत्ता को भारत के नवधनाढ्य , नए मध्यवर्ग का निर्लज्ज साथ मिल रहा है।
*यह साधारण जन , आदिवासी , किसान , मजदूरों के बड़े सांस्कृतिक मूल्यों को उजाड़कर सत्ता अपने सांस्कृतिक वर्चस्व को स्थापित करने में लगी हुई है ।
*बर्बर सैन्य हमलों पुलिसिया दमन के साथ मीडिया के ज़रिये उपभोक्तावादी , आत्मकेन्द्रित संस्कृति के प्रचार के ज़रिये भी सत्ता जनता की सामूहिकता और प्रतिरोध के उसके सांस्कृतिक मूल्यों को नष्ट करने में लगी हुई है । *ऐसे में साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों को सत्ता के साथ अपने रिश्ते को पुनर्भाषित करना होगा । राज्य ,पूंजी , बाज़ार , उसके उत्पाद या उसकी राजनीति के खिलाफ मुक्तिबोध सरीखे रचनाकारों की परम्परा को आगे बढ़ाना होगा । जनता के सांस्कृतिक प्रतिरोध को सशक्त बनाना होगा ।“
*इस अवसर पर ‘ हिरावल ‘ के कलाकारों ने मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता “ अन्धेरे में “ एक अंश “ ओ मेरे आदर्शवादी मन / ओ मेरे सिद्धांतवादी मन /अब तक क्या किया जीवन क्या जिया “ का गायन प्रस्तुत किया।
* शरद कोकास ने प्रलेस के महासचिव प्रो कमलाप्रसाद व कवि नासिर अहमद सिकन्दर ने जलेस के महासचिव चन्चल चौहान का सन्देश पढ़ा । कवि आलोक धन्वा का सन्देश भी पढ़ा गया ।
*इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि प्रसिद्ध क्रान्तिकारी कवि नवारुण भट्टाचार्य , झारखंड के प्रसिद्ध विद्वान बी पी केशरी , आलोचक रविभूषण , जसम उत्तर प्रदेश के राज्य अध्यक्ष प्रो राजेन्द्र कुमार , जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामजी राय , चित्रकार अशोक भौमिक , प्रलेस भिलाई के रवि श्रीवास्तव , जलेस के नासिर अहमद सिकन्दर ने भी अपने उद्बोधन प्रस्तुत किये ।
* उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध आलोचक प्रो मैनेजर पाण्डेय ने की ।
* इस अवसर पर कवि केदारनाथ  अग्रवाल ,बाबा नागर्जुन , शमशेर , अज्ञेय तथा फ़ैज़ के चित्रों व कविता पोस्टर्स की प्रदर्शन बनारस कला कम्यून तथा भिलाई के हरि सेन , अनिल कामड़े द्वारा किया गया ।
* चित्रकार अशोक भौमिक ने भारतीय चित्रकला के अनुपम उदाहरणों को स्क्रीन पर प्रस्तुत करते हुए भारतीय चित्रकला के जनपक्ष पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया ।
* इस सम्मेलन में पंकज चतुर्वेदी , सन्जय जोशी , प्रणय , सहित देश के विभिन्न क्षेत्रो से आये कवि , कथाकारों , कार्यकर्ताओं का स्वागत सचिव घनश्याम त्रिपाठी ,कैलाश बनवासी , सियाराम शर्मा ने किया ।                     
आईये पड़ोस को अपना विश्व बनायें