यह १९४७ के बाद की बात है । आज़ाद देश अब एक शिशु नहीं रहा था । बढ़ते बच्चे की तरह वह वर्ष की चौथी पायदान चढ़ चुका था ৷ आधी रात को मिली आज़ादी के समय मनाये गये उत्सव में जलाई गईं रंगीन बत्तियां लोगों के दिन चढ़े तक सोते रहने की वज़ह से दिन के उजाले में भी जल रही थीं ৷ इस बीच ऐसे कई लोग थे जो देश की सीधी सादी, भोली भाली जनता को बेवकूफ बनाकर, जन भावनाएँ भड़काकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए थे। वे चाहते थे कि पहली बार मिली स्वतंत्रता के स्वर्गीय सुख में देश की जनता कुछ साल और डूबी रहे ৷ लेकिन इस बीच सब धर्मों की अलग अलग किताबों से ऊपर राष्ट्र धर्म की एक किताब जिसे संविधान कहते हैं देश में लागू की जा चुकी थी ৷ लोग उसे पूज नहीं रहे थे बल्कि पढ़ रहे थे । इस देश का आम आदमी भविष्य में लिखी जाने वाली दुष्यंत की इस काव्य पंक्ति को जी रहा था
सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर
झोले में उसके पास कोई संविधान है ।
अंतरिम सरकार में शामिल हमारे तारनहार भी यह सत्य जान गए थे कि इन सरफिरों को यूँही नहीं बहलाया जा सकता इसलिए चार साल बाद ही सही उचित समय देखकर अक्तूबर उन्नीस सौ इक्यावन से फरवरी उन्नीस सौ बावन के बीच चुनाव कराये जाने की घोषणा कर दी गई ৷ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात होने वाले देश के प्रथम लोकसभा चुनाव के लिए जनता का उत्साह कुछ इस तरह था जैसे उन्हें बहन या बेटी के लिए वर का चयन करना हो ।
जनतांत्रिक पद्धति से होने वाला यह पहला लोक सभा चुनाव सभी के लिए उत्सुकता का विषय था ৷ हमारा देश इस पहले लोकसभा चुनाव में विश्व के विभिन्न देशों की तरह सार्वजनीन वयस्क मताधिकार पद्धति अपना कर जनतंत्र की राह पर आगे बढ़ने हेतु कदम रख चुका था ৷ इस चुनाव में देश के चौरानबे संसदीय क्षेत्रों में यह व्यवस्था थी कि एक मतदाता दो वोट दे सकता था, एक सामान्य सीट से खड़े होने वाले प्रत्याशी के लिए तथा दूसरा वोट आरक्षित सीट से खड़े होने वाले प्रत्याशी के लिए ।
उन्नीस सौ सत्तावन तक दो वोट देने की यह व्यवस्था चलती रही । उस समय सन उन्नीस सौ तीस से बत्तीस तक तीन साल तक लगातार गोलमेज परिषद हुई थी । इस परिषद में डॉ.आंबेडकर ने यह प्रस्ताव रखा था कि श्येडूल्ड कास्ट बहुल क्षेत्रों में उन्हें न्याय दिलाने हेतु उनका भी एक प्रतिनिधि निर्वाचित किया जाए । यद्यपि उनके लिए स्वतंत्र मतदार संघ की बात नहीं मानी गई थी लेकिन गाँधीजी इस द्विस्तरीय चुनाव व्यवस्था और अलग से एक प्रतिनिधि के निर्वाचन के लिए वे तैयार थे । यह व्यवस्था उन्नीस सौ पैंतीस के इंडिया एक्ट के तहत की गई । इसी आधार पर प्रारंभ में उन्नीस सौ सैंतीस में मुंबई व मद्रास प्रोविंस के चुनाव भी हुए थे । बाबासाहेब द्वारा इसी परिषद् में नए संविधान में इस वर्ग के प्रतिनिधित्व की बात भी रखी गई थी ।
बाबासाहेब आंबेडकर संविधान निर्माण हेतु बनाई गई ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष रह चुके थे ৷ संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका एवं महत्ता साबित हो चुकी थी इसलिए नेहरू जी की इच्छा थी कि बाबासाहेब कांग्रेस की सीट पर यह चुनाव लड़ें ৷ बाबासाहेब ने उनकी इच्छा का सम्मान अवश्य किया लेकिन वे सिद्धांतवादी थे, अपने नीतिगत मतभेदों की वज़ह से उन्होंने कोई समझौता नहीं किया न ही कोई प्रलोभन उन्हें भटका सका ৷ उन्होंने दलितों के अधिकारों के लिए गठित अपनी पार्टी शिड्यूल कास्ट फेडरेशन से ही चुनाव लड़ना तय किया ৷ सन उन्नीस सौ बयालीस में स्थापित इस फेडरेशन के वे संस्थापक थे ৷
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| काजरोलकर |
उन्होंने मुंबई के उत्तर मध्य क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी प्रारंभ की ৷ मुंबई लोकसभा क्षेत्र से दो प्रत्याशी चुने जाने थे एक सामान्य सीट से और एक आरक्षित सीट से । आरक्षित सीट से बाबासाहेब आंबेडकर के विरुद्ध कांग्रेस के नारायण सदाशिव काजरोलकर प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे ৷ सामान्य सीट से कांग्रेस के विट्ठल गाँधी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता, सी पी आई के अमृत श्रीपाद डांगे , आर आर पी यानि राम राज्य परिषद से केशव जोशी, तथा स्वतन्त्र उम्मीदवार के रूप में नीलकंठ परुलेकर व गोपाल देशमुख ऐसे लगभग आठ प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे ।
मज़े की बात यह कि बाबासाहेब के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी काजरोलकर बाबासाहेब आंबेडकर के ही शिष्य थे लेकिन इस वक्त वे कांग्रेस द्वारा गोद लिए जा चुके थे ৷ राजनीति के ओलम्पिक में कूटनीति के कुछ नए खेल शामिल किये जा रहे थे । फिर भी बाबासाहेब अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे । उन्हें विश्वास था, देश की जिस जनता की अस्मिता के लिए वे हमेशा से लड़ते आये हैं, वह जनता उनका साथ अवश्य देगी ৷
लेकिन उन्हें ज्ञात नहीं था कि चुनाव तो षडयंत्रों की पाठशाला होती है जिसका प्रथम सत्र इसी प्रथम चुनाव से प्रारंभ
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| सुकुमार सेन |
होने जा रहा था ৷ आगे की कक्षाओं में पढाया जाने वाला बूथ कैप्चरिंग,ई वी एम मैनेजमेंट , हॉर्स ट्रेडिंग इत्यादी का पाठ्यक्रम अभी तैयार नहीं हुआ था ।संविधान के साथ ही चुनाव आयोग का भी जन्म हुआ था । प्रथम चुनाव आयुक्त के रूप में सुकुमार सेन की ज़िम्मेदारी थी इस प्रथम चुनाव को भलीभांति संपन्न करवाना ৷ यह देश का बहुत महत्वपूर्ण चुनाव था । इस चुनाव से एक ऐसी परम्परा स्थापित होने जा रही थी जिस पर सम्पूर्ण देश एवं जनतंत्र का भविष्य टिका हुआ था ৷
मुंबई उत्तर मध्य के इस संसदीय क्षेत्र से सामान्य सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार थे विट्ठल बालकृष्ण गाँधी । वे मूलतः रत्नागिरी के रहने वाले थे और कांग्रेस की राजनीति में काफी सक्रिय थे । वे अमेरिका से पढाई करके लौटे थे इसलिए उन्हें अमेरिकन गाँधी भी कहा जाता था । वे नेहरु जी के बहुत प्रिय थे और मुंबई के मेयर रहते हुए उन्होंने सार्वजनिक परिवहन में प्रयुक्त होने वाले टैक्सी को पीले और काले इन दो रंगों में पेंट करने का यह सुझाव दिया था । यह सुझाव आज तक अमल में लाया जा रहा है । विट्ठल गाँधी के विरुद्ध प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता, कम्युनिस्ट पार्टी के श्रीपाद अमृत डांगे जैसे महत्वपूर्ण लोग चुनाव लड़ रहे थे ।




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