11 अगस्त 2009

कवि और कविता से डरा भी हूँ मैं

चित्र में तीन कवि शरद कोकास,विजय सिंह और एकांत श्रीवास्तव
विजय सिंह

विजय सिंह मेरा बहुत प्यारा दोस्त है,कवि भी है और चर्चित साहित्यिक पत्रिका "लेखन सूत्र" का सम्पादक भी । उसका यह पहला पत्र जो उसने मुझे 2002 में लिखा था । अक्सर कवि मित्र पत्र में साहित्यिक समाचार अधिक लिखते हैं लेकिन यह पत्र एक कवि का नहीं एक मित्र का है इसलिये इसके हर शब्द से मैत्री भाव और मित्र के प्रति प्रेम नि:सृत होता है । गुम होती पत्र संस्कृति को जीवित रखने के प्रयास में विजय सिंह ने अभी अभी 'सूत्र 'का एक पत्र विशेषांक भी जारी किया है जिसमे हिन्दी के साहित्यकारों के कई दुर्लभ पत्र हैं । यह पत्र उसमें शामिल नहीं है । इस पत्र में प्रकट मैत्री भाव सम्पूर्ण जगत में व्याप्त हो इस कामना के साथ प्रस्तुत है "एक दोस्त की चिठ्ठी" - शरद कोकास

जगदलपुर ,बस्तर 7अप्रेल 2002 की एक शाम

प्रिय शरद
वर्षों –वर्षों बाद तुमने मुझे सोते से जगा दिया है । इतना आत्मीय और इतना भरा-भरा सा पत्र पाकर मैं फूला नहीं समा रहा हूँ । मुझे याद नहीं पड़ता कि कब किसने मुझे इस तरह से दिल में लगाकर लिखा हो । तुम्हारे मोती जैसे अक्षरों का तो मैं शुरू से कायल रहा हूँ , फिर कौन भला इतने जतन से लिखे,सुनहरे और हर्षमिश्रित रंगों से आत्मीय शब्दों को पाकर पगला ना जाये । यदि लड़की होता तो यकीनन तुम पर मर मिटता (मरता तो अब भी हूँ ) । समझ में नहीं आ रहा कि अपनी खुशी कैसे व्यक्त करूँ ?
शरद,तुमने तो मुझे इस बेजान समय में फिर से ज़िन्दा कर दिया है । इस कम्प्यूटर युग में जब व्यक्ति अपना नाम भी अपने हाथों से लिखने में कतराने लगा हो तब तुमने जिस धैर्य और संवेदना से मुझे लिखा है ,पत्र पढ़कर मेरा मन इस काठ समय में एक हरे और फलदार वृक्ष में तब्दील हो गया है इस सुन्दर से फुलस्केप कागज़ के दोनो ओर भरे-भरे अक्षरों में तुम्हारे मन को देख रहा हूँ..छू रहा हूँ और उन दिनों को याद कर रहा हूँ जब मैं शरद कोकास नाम के कवि को अमृत सन्देश के पन्नों में पढ़कर जानने लगा था । और एक दिन रायपुर के जयस्तम्भ चौक से रिक्शे में गुजरते वक़्त पास के बुकस्टाल में शरद कोकास का नाम एक संग्रह में पढ़कर ठिठक गया था । रिक्शा रुकवाकर मैने उस संग्रह को छुआ तो वह सिर्फ इसलिये कि मेरी स्मृति में तुम्हारा नाम और तुम्हारी कवितायें थीं...फिर बहुत वर्षों बाद त्रिधारा के कार्यक्रम में तुमसे बतियाने का मौका भी मिला । तब तुम्हे ठीक वैसा ही पाया जैसा कि तुम्हे मैने तुम्हारी कविताओं में पढ़कर जाना था । सच उस दिन तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा और मैं डरा भी नहीं..अन्यथा बहुत से नामचीन कवियों को मैने उनकी कविताओं से एकदम उलटबाँसी पाया है और कवि और कविता से डरा भी हूँ
लेकिन शरद कोकास जैसे सहज कवियों से मिलकर कविता और उसकी सच्चाई पर विश्वास किया जा सकता है , यह मैने उस दिन जाना था । इसलिये मैं मुखौटों से नहीं डरता ..हमारा जो जीवन है ना शरद ,वह पानी की तरह है ,जिसमे ना कोई दुराव है ना कोई छिपाव .. जो कुछ भी है सहज ..खुला सा.. प्यार से लबालब ..शरद की तरह ..। जिस गुनगुनी धूप को पढ़कर मैने शरद को छुआ था आज इस कड़ी दोपहरी में उसकी शीतलता से अपने को तरो ताज़ा पा रहा हूँ ।
अन्यथा मत लेना.. तुम मुझे विस्मृत कर रहे हो उस दिन मैने यूँही लिख दिया था .. यह पत्र तुम्हे पूरे एक हफ्ते बाद लिख रहा हूँ ..सच बताऊँ इतने दिनों तक तुम्हारे पत्र में ही खोया था ..और अपने को लगातार उस लायक बना रहा था कि तुमको लिख सकूँ..चाहता तो तुमको फोन करके बतिया सकता था .. अब मात्र फोन कर तुम्हे खोना नहीं चाहता ..विश्वास करो शरद, जिस दिन से तुम्हारी चिठ्ठी मिली है मैं लगातार तुम्हे याद कर रहा हूँ ,अब जबकि तुमको कुछ लिख पाया हूँ तो कुछ हल्का और राहत महसूस कर रहा हूँ ।
यहाँ घर में सब अच्छे से हैं,सूरज अपनी मस्ती में रमा है शरद नाना को याद करता है । एक बार सपरिवार यहाँ आओ ।

प्यार के साथ तुम्हारा ही..... विजय सिंह

विजय का यह पत्र पढकर यदि आपके मन में अपने किसी मित्र को पत्र लिखने की इच्छा हो रही हो तो अभी लिख डालिये इसलिये कि भविष्य में जब इस भौतिक जगत से संवेदना गुम हो जायेगी हमारे शब्द ही होंगे जो उस गुम संवेदना को मनुष्य जाति के अस्तित्व के लिये फिर पुनर्जीवित करेंगे - आपका -शरद कोकास

6 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहूँ तो पत्र की आत्मियता दिल को छू गई.

    मन बना बैठा हूँ एक खोये हुए दोस्त को हस्त लिखित खत भेजने का और इसका श्रेय आपको जाता है.

    साधुवाद इस प्रेरणा के लिए.

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  2. प्रेम और आत्मियता से भरा पत्र है।आभार।

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  3. हृदय के तार तार झंकृत हो गए. विजय भाई और नरेश चंद्राकर जी के पत्रों से सर्वनाम के द्वारा अवगत हुआ था.

    आप दोनों मित्रों के निच्‍छल प्रेम को बहुत बहुत बधाई.

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  4. कितना अच्छा लगा ये खतों का अनुभव पढ़ना..क्यों ख़त्म हो गए ये सिलसिले...? ..ये किसी अपने के हस्ताक्षर में लिखा, अपनत्व से भरपूर, ख़त पढ़ना ...! e-mail में ये बात कहाँ ?

    चंद ' बिखरे सितारों ' के टुकड़े आपके इंतज़ार में हैं ..इससे पहले और बिखर जायें ,कुछ समेट लें ..! एक रहनुमाई की इल्तिजा भर है ..!

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  5. बेनामी1 मई 2010, 8:46:00 pm

    patra lekhan punah prachalan me aaye to hamare hriday ki exercise ho.patra me hriday awashyak he mastishk nahi.jai shrikrishn
    Ashutosh Munna Hoshngabad.

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