28 अगस्त 2010

पिता की अस्थियाँ छूता हूँ मैं जैसे उन्हे छूता हूँ

चार वर्ष पहले की यह बात है । एक दिन मुझे मेरे मित्र नरेश चन्द्रकर का पत्र मिला कि पिता नहीं रहे । पिता का जाना क्या होता है यह वही समझ सकता है जो इस दुख के अलाव को पार कर चुका हो । मुझे अपने पिता की याद आ गई और मैंने एक पत्र लिखा नरेश को यह सोचकर कि शायद यह पत्र दुख से उबरने में उसकी मदद करे । आज 28 अगस्त मेरे पिता की पुण्यतिथि है , मैं ब्लॉग में लगाने के लिये उनका लिखा हुआ कुछ ढूँढ रहा था कि कागज़ोँ में यह पत्र मिल गया .. सो इस पत्र के कुछ अंश यहाँ दे रहा हूँ ,अपने पिता के लिये , नरेश के पिता के लिये और उन सभी मित्रों के पिताओं के लिये जो एक दरख़्त की तरह हम पर साया करते रहे और एक दिन हमें दुनियादारी की इस चिलचिलाती धूप में ज़िन्दगी से दो दो हाथ करने के लिये छोड़कर चले गये । उन सभी के हम शुक्रगुज़ार है जिन्होने ज़िन्दगी का पाठ हमें पढ़ाया । उनके प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए ....।

 दुर्ग 25/09/2006

                                                                                    
           प्रिय नरेश , आज तुम्हारा पत्र मिला । तुम्हारे पिता का निधन 4 सितम्बर  को हुआ यह मुझे आज पता चला इस बात को  आज 21  दिन हो गए हैं और अब इतने दिनों बाद मैं तुम्हारे दुख में शामिल हो पा रहा हूँ ।
            28 अगस्त 2003 को मेरे पिता जगमोहन कोकास का देहावसान हुआ था । उस वक़्त मेरे एक करीबी मित्र महावीर अग्रवाल  ( सम्पादक ‘ सापेक्ष ‘ ) ने मुझे ढाढस बँधाते हुए कहा था कि यह दुखद समय हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी आता ही है । मैं भी आज तुमसे यही कहना चाहता हूँ । हर देह का अपना एक निश्चित समय होता है , कोशिकाओं से यह तन्त्र बनता है , देह के साथ साथ यह मज़बूत होता है , फ़िर एक समय आता है कि कोशिकायें साथ छोड़ने लगती हैं ,वार्धक्य अपना प्रभाव दिखाना प्रारम्भ कर देता है ,शरीर के अंग एक एक कर अपना काम करना बन्द कर देते हैं और अन्ततः एक दिन यह शरीर समाप्त हो जाता है ।
            इस तरह इस देह की मृत्यु की शुरुआत तो जन्म के साथ ही हो जाती है , ज़रा ध्यान से सोचो, हम सभी प्रतिदिन थोड़ा थोड़ा मर नहीं रहे हैं क्या ? फिर यह अमर होने की आकांक्षा क्यों है ? यह तृष्णा क्यों है ? लेकिन यह अस्वाभाविक नहीं है । मनुष्य के पास सोचने की क्षमता है तो वह विचार करेगा ही । आज हम मृत्यु को जान रहे हैं इसलिये उसके बारे में सोच सोच कर चिन्तित हो रहे हैं लेकिन जब मनुष्य यह सब नहीं जानता था तब क्या होता था ? मेरी लम्बी कविता “ पुरातत्ववेत्ता “ का पृष्ठ 23 खोलो और यह पँक्तियाँ पढ़ो ……।
                        वह जीवन जो अपने उपमानों में नहीं है
उसकी कोई एक शैली या ढंग नहीं
वह जो अपनी जड़ों से उत्स लेता है
जीवद्रव्य में तैरते हैं मनुष्य के स्वप्न
दिमाग़ की घाटी में चमकती है अतीत की अनुभूतियाँ
जब एक दिन उसने आग पकड़ने की कोशिश की थी
इसलिये कि वह उस वक़्त की सबसे चमकदार चीज़ थी
और स्त्री की देह से निकलता माँसपिंड देख चौंका था वह
यह क्या बला है उससे मिलती - जुलती
और हक्का-बक्का बैठा था वह अपने सहोदर की लाश के पास
कि उसे नहीं पता था मौत क्या होती है
            तुम्हारे पिता सिद्धांतवादी थे ,इस बात को भी मैं भलिभाँति समझ सकता हूँ । लेकिन मृत्यु पर क्या कहूँ               मृत्यु केवल सजीवों का गुणधर्म नहीं इस अर्थ में
कि इच्छाओं और सपनों का मर जाना भी मौत है
डरना चुप रहना कुछ न करना भी इसमें शामिल
और मान भी लिया जाए यह अपनी सहजता में
तो अर्थ क्या फिर निर्जीव की मौत का
दिल बहलाने वाली हैं आत्मा- परमात्मा के जीवन मृत्यु की बातें
यह श्मशान का वैराग्य है जीवन से भागे मनुष्य के जीवन में
यह अच्छा हुआ कि उन्होने अपने अन्तिम दिन के लिये बातें तय कर दीं और यह भी कि तुमने उनकी अंतिम इच्छा का पालन किया । फिर भी कई बार हमें परिवार और समाज की इच्छा के अनुसार भी चलना पड़ता है । मेरे पिता पिण्डदान, मृत्युभोज के आजीवन खिलाफ रहे और मैंने भी उनकी इच्छा का पालन किया ,लेकिन इस समाज के साथ रहकर । मैंने स्थानीय शिवनाथ नदी में पिता की अस्थियाँ विसर्जित करते समय कुछ अस्थियाँ अपने पास रख ली थीं , माँ की भी कुछ अस्थियाँ मेरे पास हैं जो मेरे लिखने की टेबल पर एक प्लास्टिक की डिब्बी में मेरे लिखने की टेबल पर रखी हैं ,जब भी मेरा मन होता है मैं उन्हें छूकर देख लेता हूँ , ऐसा लगता है जैसे मैंने माता-पिता का स्पर्श किया हो ।
ऐसा करके देखो, तुम्हे लगेगा कि तुम्हारे पिता कहीं नहीं गए हैं वे तुम्हारे साथ ही हैं ,तुम्हारे साथ तुम्हारी कविता की पँक्तियों में । बेहतर होगा कि अपने परिवार जनों को वैज्ञानिक तरीके से यह बात समझाओ न कि पुरातन पंथियों की दृष्टि से उन्हे मृत्यु का अर्थ बताओ । यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण जीवन में उत्साह व उमंग का संचार करेगा इसके विपरीत धार्मिक दृष्टिकोण ,आत्मा- परमात्मा का झमेला ,जीवन में अवसाद पैदा करेगा ।
                        अनंत है आकाश जन्म- मृत्यु की बहस का
जहाँ मोक्ष की चीलों के साथ मंडराते हैं पाप- पुण्य के कौवे
जिनमें प्रवेश कर आत्माएँ उड़ातीं पितृपक्ष में दावतें
वहीं पुरातत्ववेत्ता खोजते हड्डी और कोयले में रेडियोधर्मिता
मरने के बाद भी वह उपस्थित रहती हर सजीव में
मनुष्यों में पेड़ों में पशुओं और पक्षियों में
और उसके लिए आत्मा का होना न होना बराबर

            इसलिये मेरे प्यारे मित्र , मेरे भाई इस दुखद प्रसंग को भूलने की कोशिश मत करना । सहजता तो जीवन का अनिवार्य लक्षण है , वह तो आना ही है । लेकिन एकांत में , घर में ,दफ़्तर में जब भी पिता को स्मरण करने का अवसर मिले उन्हे अवश्य याद करना । पुरखों को बार बार याद करना और उनका स्मरण कर भाव विव्हल हो जाना यह हमारी कमज़ोरी नहीं है बल्कि यह हमारी ताकत और संवेदनशीलता का परिचायक है । यही हमारे मनुष्य होने का सबूत भी है । यह स्मरण ही हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देगा , बहते हुए आँसू हमारी दृष्टि को इतना साफ कर देंगे कि हमें आगे का रास्ता साफ साफ दिखाई देगा । अब तुम इस बात को भलिभाँति समझ गये होगे कि पिता क्यों चाहते थे कि तीन दिन बाद कोई शोकमग्न न बैठे । वे केवल सिद्धांतवादी नहीं थे ,सिद्धांतों को उन्होनें जीवन में इस तरह ढाला था कि उस यथार्थ से उपजकर ही उनकी इच्छा में यह निर्णय शामिल हुआ था ।
            दुख से उबर कर सामान्य होना यह दुनियादारों का वाक्य है । लेकिन क्या सामान्य हो जाना ही एकमात्र उपाय है ? यह एक तरह का सामान्यीकरण है । सामान्य होने का एक अर्थ उस व्यक्ति को या उसके विचारों को विस्मृत कर देना भी तो हो सकता है ।
            एक बात तुम्हे अवश्य कचोट रही होगी ,अपने पिता के अन्तिम दर्शन न कर पाने और उन्हे स्पर्श न कर पाने का मलाल । वह समय तो अब वापस नही आ सकता लेकिन उसकी कल्पना अवश्य की जा सकती है । मैं तुम्हे एक सलाह देना चाहता हूँ । ऐसा करो …घर में पिता की कुछ वस्तुएँ होंगीं ,उन्हे ठीक पिता की तरह स्पर्श करो , जहाँ वे बैठते थे उस जगह पर जाकर कुछ देर बैठो , उनका कोई वस्त्र हो तो उसे कुछ देर धारण करो , कभी उनके अन्दाज़ में बोलने का और चलने का प्रयास करो । उनके जैसे अक्षर बनाने का प्रयास करो , भाभी से , पाँखुरी और प्रतीक से वे जो कुछ कहते थे वैसा कुछ कहने की कोशिश करो । उनकी प्रिय पुस्तक पढ़ो , वे जो संगीत सुनते थे उसे सुनो । उनके मित्रों से बात करो । ( मैं जानता हूँ कोई और व्यक्ति यह पढ़ेगा तो हँसेगा …लेकिन उसके और तुम्हारे संवेदना के स्तर में फ़र्क तो है ही ) इसलिये ऐसा करते हुए किसी के कहने से अपमान भी महसूस मत करो । कुछ देर आँखें बंद कर शांत मन से बैठो , तुम अपने पिता का स्पर्श अपने सर पर महसूस करोगे । बच्चों को प्यार करो तो तुम्हे लगेगा तुम्हारे पिता तुम्हे प्यार कर रहे हैं , तुम्हारा आलिंगन कर रहे हैं । मुझे यकीन है फ़िर तुम्हे उनके अन्तिम दर्शन न कर पाने का मलाल कभी नहीं होगा …। वैसे भी अंतिम कहाँ कुछ होता है |
            अंत में यह कि तुम्हे यह सब लिखते हुए पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि यह सब अपने लिये लिख रहा हूँ या दुनिया के उन तमाम बेटे-बेटियों  के लिये जिनके पिता नहीं रहे । अब कुछ देर अपने पिता की तस्वीर के पास बैठूंगा और तुम्हारे पिता को याद करूंगा । आत्मा मैं मानता नहीं वरना आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता । फ़िलहाल तुम्हारे और अपने और दुनिया के उन तमाम लोगों के मन की शांति के लिये कामना कर रहा हूँ इसलिए कि यह मन देह में कहीं नहीं होता है लेकिन हरदम यही साथ होता है चाहे शरीर से कोई कितनी भी दूर क्यों न हो । 

                                                                        तुम्हारा – शरद कोकास 

(चित्र : अपनी युवावस्था में मेरे पिता जगमोहन कोकास )

11 टिप्‍पणियां:

  1. डूब गया पढ़ते पढ़ते. कितनी गहरी समझाईश है.

    पिता जी को नमन एवं श्रृद्धांजलि.

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  2. पुरखों को बार बार याद करना और उनका स्मरण कर भाव विव्हल हो जाना यह हमारी कमज़ोरी नहीं है बल्कि यह हमारी ताकत और संवेदनशीलता का परिचायक है, यही हमारे मनुष्य होने का सबूत भी है।

    पिता जी को नमन एवं श्रृद्धांजलि

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  3. पिता जी का चित्र देखते लगा कि मैं कोपल को देख रहा हूँ! नहीं?

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  4. अब क्या कहे..... मै भी कुछ समय पहले ही अपने पिता ओर मां को खो चुका हुं. आप के दोस्त को हम सिर्फ़ तस्सली ही दे सकते है

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  5. माता पिता का स्थान कोई नहीं ले सकता और उन्हें खोने का दुःख मैं अच्छी तरह से समझ सकती हूँ! बहुत ही मार्मिक पोस्ट! पिताजी को मेरा शत शत नमन और श्रधांजलि अर्पित करती हूँ!

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  6. क्या कहूं? चुपचाप पढूं, बस यही बेहतर है.

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  7. पढ़ते वक़्त बिलकुल numb हो गयी थी...इतने गहराई से महसूस करके लिखा है आपने....बहुत संबल मिला होगा,आपके मित्र को.
    पिता जी को नमन और श्रधांजलि

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  8. मार्मिक !पिता जी को नमन एवं श्रृद्धांजलि.

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  9. प्रिय बंधुवर शरद कोकास जी

    बहुत भावपूर्ण पोस्ट है …
    आपकी हर भावना के साथ सहमति और सह अनुभूति है, लेकिन मुख्य बात ही , जिसे आपने शीर्षक भी बनाया है नहीं जच रही ।
    मानें न मानें , परंपरानुसार संपूर्ण अस्थि-भस्मि-विसर्जन हो जाना चाहिए ।
    मृतात्मा की आत्मा को शांति मिली या नहीं हमारे मन को अवश्य मिलती है । आप किसी गुणी से ( कर्मकांडी नहीं ) बात करें ।
    आस्था और विश्वास के लिए मूर्ति की आवश्यकता नहीं होती ।

    आपकी भावनाओं को समर्पित हैं कुछ पंक्तियां …



    गए थे छोड़ कर इक दिन , न वापस आप घर आए !
    न क्यों फिर आप बाबूजी ! कहीं पर भी नज़र आए ?

    न ही आंसू , न ग़म , हम आपके रहते' कभी समझे ,
    अब आंखें नम लिये' ; हर पल लिये' दुख की ख़बर आए !

    किसी से भी नहीं मिलती है सूरत आपकी जग में
    हवा , ख़्वाबों - ख़यालों में कई अब रूप धर आए !

    बहुत राजेन्द्र रोया , की दुआ , आए न बाबूजी ,
    अभागे की दुआ में हाय रब ! कैसे असर आए ?!


    शरदजी , बहुत भावपूर्ण है मेरी यह रचना , गाई हुई भी है ।
    पूरी रचना पढ़ने और सुनने के लिए कभी तसल्ली सहित समय निकालें ।
    लिंक है -
    शस्वरं
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  10. आपके इस पत्र ने वह वक्त याद दिला दिया जब मेरे पिता कैन्सर की बीमारी से लडते लडते काल कवलित हुए थे । मेरी उम्र तब मात्र 24 वर्ष थी । आपकी इस श्रध्दांजली में मैने भी अपने पिता को श्रध्दा सुमन चढाये ।
    आप की तरह और कोई हो नही सकता ।

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आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें