19 फ़रवरी 2010

इतना सब पढ़ने के बाद भी हम ब्लॉग पढ़ते हैं


      

 राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना सन 1988 में हुई । और इसके तुरंत बाद देश के विभिन्न ज़िलों में साक्षरता अभियान की शुरुआत हुई । दुर्ग ज़िले में भी इस अभियान का प्रारम्भ 1990 में हुआ । राष्ट्रीय महत्व के इस कार्यक्रम में मेरी तरह बहुत से लोगों ने रुचि ली और स्वेच्छा से इस कार्यक्रम में जुट गये । कुछ शासकीय लोगों को अनिच्छा से भी जुड़ना पड़ा । बहरहाल उन दिनों जब यह आन्दोलन उफान पर था इसमें नये नये अनुभव हुए । ऐसे अनेक अनुभवों का खजाना मेरे पास है ।
हम लोगों ने निरक्षरों को अक्षर ज्ञान देने के लिये जिन्हे प्रशिक्षण दिया  था उन्हे हम अक्षर सैनिक कहा करते थे । इनमें स्कूल कॉलेज के छात्र - छात्रायें , गृहणियाँ और ऐसे ही समाज सेवी लोग थे जो निशुल्क यह कार्य किया करते थे । शाम के समय जिस मोहल्ले से गुजरो वहाँ कक्षायें चलती दिखाई देती थीं । उन दिनों जिन लोगों ने पढ़ना –लिखना सीखा उनमें से बहुत से लोग आज भी पढ़ लिख लेते हैं । लेकिन यह आन्दोलन जिस तरह से चला उसी तरह से समाप्त भी हो गया और फिर से निरक्षर लोगों की एक फौज तैयार हो गई । तत्कालीन जिलाधीश व साक्षरता समिति के अध्यक्ष श्री विवेक ढाँढ की यह बात मुझे अच्छी तरह से याद है वे कहा करते थे “ यदि हम गीले फर्श को पोछ पोछ कर सुखा रहे हैं और नल खुला ही है तो फर्श सुखाने का क्या फायदा ? “ इस बात का अर्थ पढ़े- लिखे लोग तो कम से कम समझ ही सकते हैं ।
पिछले दिनो ऐसे ही एक व्यक्ति से मुलाकात हुई जिसने उन दिनों पढ़ना- लिखना सीखा था । मैने उससे पूछा “ क्यों अभी भी पढ़ लेते हो कि सब भूल गये ? “ उसने बताया कि वह अखबार पढ़ लेता है ,और दुकानों के साइन बोर्ड पढ़ लेता है । मेरे मन में विचार आया कि हममें और उस व्यक्ति में क्या अंतर है , यही कि हम कुछ ज्यादा पढ़े –लिखे हैं तो कुछ ज़्यादा चीज़ें पढ लेते है , और फिर मैने एक सूची बनाई कि हम दिन भर में क्या क्या पढ़ते हैं । प्रस्तुत है आप लोगों के अवलोकन के लिये ।
                                                हम क्या क्या पढ़ते हैं ?

1.सुबह हमारी अखबार से होती है ,जिसमें हम सरसरी निगाह से समाचार पढ़ते हैं और विज्ञापन पढ़ते हैं । ( ईमानदारी से बताइयेगा कितने लोग सम्पादकीय पढ़ते हैं )
2.स्कूल कॉलेज के छात्र-छात्रायें अपनी कोर्स की किताबें पढ़ते हैं ।
3.टी.वी.देखते हुए हम समाचारों के चैनल में नीचे दिखाई देने वाले सब टाइटल्स पढ़ते हैं । जल्दी जल्दी दिखाये जाने वाले विज्ञापनों में नाम पढ़ते हैं । फिल्म देखते समय टाइटल्स पढ़ते हैं ।
4.हम बाज़ार में निकलते हैं तो दुकानों के साइन बोर्ड पढ़ते हैं ।चौक चौराहों पर लगे होर्डिंग्स पढ़ते हैं ।
दीवारों पर लिखे नारे और विज्ञापन पढ़ते हैं ।
5.सामान खरीदते समय हम उत्पाद का नाम पढ़ते हैं , मूल्य पढ़ते हैं उसकी गुणवत्ता के बारे में लिखी झूठी-सच्ची बातें पढ़ते हैं ।
6.दवायें खरीदते समय हम उसकी एक्सपायरी डेट पढ़ते हैं । उसके कम्पोज़ीशन के बारे में पढ़ते है ।उसके उपयोग का तरीका पढ़ते हैं ।
7.हम दफ्तर में अपनी फाइलें पढ़ते हैं , नोटशीट पढ़ते हैं ,आवेदन पढ़ते हैं , मेमो पढ़ते हैं , कम्प्यूटर पर काम से सम्बन्धित बातें पढ़ते हैं । वकील, जज,और अन्य प्रोफेशनल्स अपने प्रोफेशन से सम्बन्धित बातें पढ़ते हैं ।
8.बैंक में जमा पर्ची,व आरहण पर्ची पढ़ते हैं . ए.टी.एम से निकली पर्ची पढ़ते हैं, पासबुक पढ़ते हैं । लोन लेने के फॉर्म पर लिखी शर्तें पढ़ते हैं , परिसर में लगे सूचना पट्ट पढ़ते हैं ।चेक व नोट में लिखी राशि पढ़ते हैं ।
9.व्यापारी माल का बिल पढ़ते हैं, तगादे की चिठ्ठी पढ़ते हैं । उधारी ले जाने वाले ग्राहकों की सूची पढ़ते हैं । कच्चे-पक्के रजिस्टर पढ़ते हैं ।
10.हम घर में आनेवाला ,टेलीफोन ,बिजली,अखबार, केबल .किराना दुकान ,लाँड्री, नगर निगम टैक्स का बिल पढ़ते हैं ।
11.मित्रों –रिश्तेदारों की चिठ्ठियाँ पढ़ते हैं । बधाई पत्र , विवाह के निमंत्रण पत्र पढ़ते हैं । सम्भालकर रखे गये हों तो पुराने प्रेमपत्र पढ़ते हैं ।
12.हम मोबाइल पर एस.एम.एस पढ़ते हैं । गानों की सूची पढ़ते हैं । काल लॉग पढ़ते हैं ।  
13.हमारे बुज़ुर्ग धार्मिक ग्रंथ पढ़ते हैं ।जन्मपत्री पढ़ते हैं । विवाह योग्य बच्चों की कुंडली पढ़ते हैं ।
14.यह सब पढ़ने के बाद बचे हुए समय में पत्र पत्रिकायें पढ़ते हैं । ( पत्र-पत्रिकाओं में क्या पढ़ते हैं ,यह एक अलग लेख का विषय है )
इतना सब पढ़ने के बाद भी हम ब्लॉग पढ़ते हैं । ( ब्लॉग्स में  हम क्या क्या पढ़ते हैं यह भी अलग लेख का विषय है ) । फिलहाल तो यह बताइये कि आप इसके अलावा और क्या पढ़ते हैं ? - आपका पड़ोसी - शरद कोकास 
आईये पड़ोस को अपना विश्व बनायें

17 टिप्‍पणियां:

  1. हाय दैया.. आज पता चलो के कित्ते पढ़ाकू हैं हम लोग....
    वाह भाईसाब
    जय हिंद..

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  2. जीवन पढने का नाम ,पढ़ते रहो सुबह ओ शाम :)

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  3. चेहरे, आँखे, हावभाव भी पढ़ते है सब लोग

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  4. ....बहुत ही शानदार लेख....बहुत अच्छा लगा....

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  5. बहुत सुंदर आप तो अब हमारी पोल ही खोल रहे है जी.... जाओ हम नही टिपयाते:)

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  6. वाकई गहन विश्लेषण किया है ।

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  7. इसके अलावा तो पत्नी की आँखों में उपजा सैलाब पढ़ते है जिसके लिए सबसे कम समय बचा रह जाता है. :)

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  8. इसके अलावा?

    आपकी पोस्ट पढ़ रहे हैं :-)

    बी एस पाबला

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  9. संपादकीय पढ़ना मेरे पेशे की आवश्यकता है...

    वैसे अब तो जब भी फुर्सत हो बस ब्लॉग ही पढ़ते हैं...

    शरद भाई, विश्वास और अंधविश्वास से जुड़ी मेरी आज की पोस्ट...चमत्कार को नमस्कार...सुबह से आपकी राय का इंतज़ार कर रही है...

    जय हिंद...

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  10. शरद जी,
    मुबई में भी एक मुहीम चल रही है ' Each one teach one ' काफी सफल हो रहा है यह अभियान..मेरे सुपुत्र भी इसके सदस्य हैं.
    इन सबके अलावा और क्या पढ़ती हूँ....इच्छा तो नहीं थी बताने की..पर ये राज़ बता ही देते हैं...अखबारों में लिपटे बाज़ार से आए सामान, ड्राई क्लीनिंग के कपडें...कई बार उन अखबारों को भी उठा कर पढने लगती हु..(और मेरा विश्वास है..यह अकेले मेरी आदत ही नहीं होगी..:))

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  11. oh my god! itna padhte hain aur sab sir ke upar se gujar jata hai inmein se kisi par bhi amal nhi karte ......hahahaha.

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  12. हम अपनी पूरी ईमानदारी से कहते हैं सिर्फ सम्पादकीय पढ़ते हैं ध्यान से ....बाकी सब सरसरी निगाह से ...
    ब्लोग्स पर सब पढ़ते हैं ...कविता कहानी , विज्ञान और श्रद्धा भी ...!!

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  13. हमारा तो बहुत सा समय ट्रेन रनिंग के आंकड़े पढ़ने गुनने में निकल जाता है। शुष्क नीरस और बेजान आंकड़े!

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