29 अगस्त 2016

मेरे साथ रहती हैं मेरे माता-पिता की अस्थियाँ



देह का अंतिम हश्र यही होता  है 

आज मेरे पिता स्मृतिशेष जगमोहन का स्मृति दिवस है । माता स्मृतिशेष शीला देवी का निधन 8 अगस्त 2001 को हुआ था और पिता का ठीक उनसे  दो वर्ष बाद 28 अगस्त 2003 को । तेरह वर्ष हो गए पिता को गुज़रे हुए । उनके संघर्ष से हमने संस्कार पाए ,उनकी आदतों को हमने अपने भीतर ढाला ,उनकी सामाजिक सेवा और साहित्यानुराग से प्रेरित हुए ।

मैं आत्मा ,मोक्ष , पिंडदान, स्वर्ग-नरक,पुनर्जन्म  किसी में विश्वास नहीं रखता पिता भी नहीं रखते थे । मुझे पता है मरने के बाद आदमी का कुछ भी शेष नहीं रह जाता ,देह भस्म हो जाती है ,ख़ाक हो जाती है । माता- पिता के अग्निसंस्कार के पश्चात उनकी अस्थियाँ नदी में प्रवाहित करते समय मैंने कुछ अस्थियाँ  अपने पास रख ली थीं जो अभी भी मेरे पास हैं । मैं जब भी उन्हें छूता हूँ तो महसूस करता हूँ कि यह कभी उनकी देह में रही होंगी । लोग कहते हैं  ..अस्थियाँ घर में नहीं रखनी चाहिए .. । मैं जानता हूँ देह जब तक जीवित रहती है प्रिय होती है, लेकिन मृत देह को लोग नष्ट कर देते हैं , यह ज़रूरी भी है , आखिर उस रूप में देह नहीं रह सकती हमारे साथ, लेकिन क्षरण होने तक अस्थियाँ तो रह सकती हैं । मुझे तो अगर दुनिया के पहले मनुष्य की अस्थियाँ मिल जाएँ तो मैं उन्हें भी रख लूँ , आखिर वे भी तो हमारे पूर्वज थे ।

पुरातत्व के मेरे गुरु डॉ. वाकणकर जी  कहते थे .. "कंकाल से क्या डरना ,डर तो ज़िन्दा आदमी से होता है , मैं तो तम्बुओं में कई बार कंकालों की बगल में सोया हूँ . ।


आज पिता को याद करते हुए अस्थियों की यह तस्वीर ...

शरद कोकास 

9 टिप्‍पणियां:

  1. ये हमारा मोह है , अहसस तो आत्मा का होता है और हसास कीजिए उनकी आत्मा सदैव पास होती है । पिताजी को शत शत नमन !

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  2. नमन उन स्मृतियों को..
    जिओ!!

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  3. में भी उतना इत्यादि में विश्वास नहीं रखता , पीर की अस्थियां उन नदियों और जगहों ओर ले गया जिनसे उनको आत्मीयता थी और उन्होंने लिखा था।

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  4. में भी उतना इत्यादि में विश्वास नहीं रखता , पीर की अस्थियां उन नदियों और जगहों ओर ले गया जिनसे उनको आत्मीयता थी और उन्होंने लिखा था।

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  5. माता पिता तो हर पल हमारे अंदर बसे हैं, उन्हें महसूस करने के लिए अस्थियां आपने साथ रखी है अच्छी बात है। पर उन्हें तो हर सांस के साथ, शरीर में बहते लहू से महसूस किया जा सकता है, हम है क्या उन्ही का लहू हमारे भीतर बह रहा है हर सांस लेने पर उनका अनुभव कर सकते है।

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    1. यह अनुभव हम अपने मस्तिष्क से कर सकते हैं ,अवचेतन में उनकी स्मृतियाँ तो हैं ही

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