14 अप्रैल 2010

उसने भिखारी से आठ आने का आटा खरीदा था

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मेरा बचपन महाराष्ट्र के भंडारा नामक कस्बे में बीता है । यह किस्सा उन दिनों का है जब मेरी उम्र 15 -16 साल रही होगी । मेरे पड़ोस में मेरा मित्र भगवान रहाटे रहा करता था । भगवान से छोटी एक बहन थी और एक छोटा  भाई । भगवान के पिता उसके बचपन में ही दुनिया छोड़ गये थे और माँ बीड़ी बनाकर पूरे परिवार का गुज़ारा करती थी । मेरी और भगवान की बहुत गहरी दोस्ती थी ।  वह रोज़ शाम मेरे घर आ जाता था । फिर हम दोनो अपने एक और मित्र नईम खान के यहाँ जाते । फिर हम तीनों भंडारा की सड़कें नापने निकल जाया करते  । रास्ते भर हम लोगों की बातचीत चलती रहती . डॉ.आम्बेडकर  का जीवन उनके जीवन की प्रमुख घटनायें ,महाड़ सत्याग्रह , नाशिक सत्याग्रह , पूना पैक्ट , यह सब पहले पहल उसीसे जाना था मैने । हम लोग अपने अपने धर्मों के अलावा अन्य धर्मों, इतिहास और दर्शन पर भी बातें किया करते थे । भगवान बौद्ध धर्म मानता था और नईम इस्लाम ,लेकिन धर्म हम लोगों की दोस्ती के  बीच कभी आड़े नहीं आता था । हम लोग एक दूसरे के घर में बैठकर एक ही थाली में खाने के आदी थे और छुआछूत मानने वालों का मज़ाक उड़ाया करते थे । हम तीनों में भगवान की आर्थिक स्थिति सबसे कमज़ोर थी, इतनी कि कभी कभी उसके घर में खाने को कुछ भी न होता था । बीड़ी कामगारों के आन्दोलन तब भी चलते थे और भगवान बचपन में ही अपनी माँ के साथ कई बार जेल जा चुका था । भगवान भी अर्थोपार्जन के लिये कभी कभी कुछ काम कर लेता था । लेकिन वह स्वाभिमानी इतना था कि मज़ाल हैं उसकी सही आर्थिक स्थिति हम लोगों को पता चल जाये ।वह जिस बस्ती में रहता था वहाँ सभी दलित थे और उनका आर्थिक स्तर भी लगभग एक जैसा ही था ।
रोज़ की तरह एक दिन शाम को जब वह मेरे घर आया तो अजीब सा मुँह बनाने लगा । मैने पूछा “ क्या हुआ ?” तो उसने कहा “ उबकाई आ रही है “ मैं हँसा ...” कुछ ऊटपटांग तो नहीं खा लिया ?” “ नहीं यार “ उसने कहा “ रोटी ही तो खाई है । ” मैं फिर हँसा ..”रोटी खाने से भी कहीं उबकाई आती है यार ।ज़रूर कुछ और खाया होगा । “ उसने कहा “ नहीं भाई रोटी ही खाई है सिर्फ रोटी ।“ मैने ज़िद पकड़ ली ..” नहीं कुछ बात तो है ।“ आखिर उसने कह ही दिया ..” क्या बताऊँ यार , घर में कल से कुछ था नहीं ,आज सुबह माँ ने कहीं से एक अठन्नी ढूँढ निकाली और सुबह सुबह एक कुष्टरोगी भिखारी आया तो उससे आठ आने का आटा खरीदा । “ मैने कहा “ तो ?” वह बोला “ यार , भिखारी से आटा खरीदकर तो हमारी बस्ती में सभी खाते हैं लेकिन उस भिखारी की पूरी उंगलियाँ गली हुई थी और उनसे  मवाद भी टपक रहा था ..उसने उसी हाथ से आटा निकाला .. बस उसी आटे की रोटी खाई है तभी से उबकाई आ रही है । “
मैं ज़ोर से ठहाका मारकर हँसा । भगवान चौंककर मेरी ओर देखने लगा “ अरे ! इसमें हँसने की क्या बात है ? “ मैने कहा “ पागल , उस आटे की तो रोटी बन गई ना ,आग में पकने के बाद तुझे लगता है कि कोई कीटाणु शेष रहा होगा ? “ वह बोला “ शरद तू कुछ भी कह ले , मुझे तो अच्छा नहीं लग रहा । “ मैने कहा “ चल आज घूमने नहीं जाते , तेरे घर चलते हैं । “ हम दोनो उसके घर पहुंचे । मैने उसकी माँ को आवाज़ दी “ मावशी ज़ोरात भूक लागली आहे ,एकाध भाकरी शिल्लक आहे काय ? ( मौसी,ज़ोर से भूख लगी है एकाध रोटी बची है क्या?) उसकी माँ ने आधी रोटी मेरे सामने रख दी , साथ में लाल मिर्ची का पाउडर । मैने आराम से मिर्च के साथ रोटी खाई और हिचकी लेते हुए कहा “ सही है यार ..इतनी तेज़ मिर्ची के साथ रोटी खायेगा तो उबकाई तो आयेगी ही । “ फिर हम दोनो खूब हँसे और हमारी हँसी में शामिल हो गये मौसी और दोनो नन्हे भाई बहन ।
मैने उस दिन तो भगवान से कुछ नहीं कहा था लेकिन आज इस बात को स्वीकार कर रहा हूँ कि एक गरीब ,दलित मित्र के घर एक कुष्ट रोगी के हाथ के छुए आटे से बनी रोटी के उस टुकड़े को खाते हुए एक बार मेरे मन में भी यह विचार आया था कि मै यह क्या कर रहा हूँ । कुष्ठ सम्बन्धी इस मिथ को तोड़ने के लिये बाद में मैं इस आन्दोलन में भी शामिल हुआ । हाँलाकि अस्पृश्यता जैसा कोई विचार उस वक़्त भी मन में नहीं था क्योंकि छुआछूत का विरोध तो मेरे संस्कारों में ही शामिल था और आज भी मैं अपने सवर्ण मित्रों के बीच जब वे जाने-अनजाने दलितों का उपहास करते हैं , दलितों का ही पक्ष लेता हूँ और उन मित्रों से कहता हूँ कि जीवन में एक बार अपने सारे राजनीतिक ,सामाजिक , धार्मिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर , सही मन से किसी ग़रीब दलित के घर जाकर उसके घर की रोटी का एक टुकड़ा खाकर देखें और उसके कष्टों का अनुभव करें और इतिहास में उनके साथ जो सलूक हुआ है उसके बारे में जाने .. उनकी सारी धारणायें बदल जायेंगी ।
मुझे नहीं पता कितने लोग ऐसा कर पायेंगे ???

मित्र एडवोकेट भगवान रहाटे से क्षमायाचना सहित ..इसलिये कि मैने उसे वचन दिया था कि यह बात जीवन में कभी किसी से नहीं कहूंगा । आज आंबेडकर जयंती पर यह वचन तोड़ रहा हूँ । - शरद कोकास 
आईये पड़ोस को अपना विश्व बनायें( चित्र गूगल से साभार )

28 टिप्‍पणियां:

  1. मार्मिक संस्मरण! यह सुकून की बात है कि आपके मित्र से आपका अब तक संपर्क है। अंबेदकर जयंती की शुभकामनायें!

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  2. दिलचस्प और प्रेरक प्रसंग (संस्मरण).

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  3. शरद जी मुझे गर्व है की आप मेरे मित्र हैं

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  4. शरद जी आपने तो हमारे दिल पर राज कर लिया, इन सब कुप्रथाओं से उठकर आपने इंसान का धर्म निभाया।

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  5. बहुत ही सुन्दर, शानदार और लाजवाब संस्मरण ! उम्दा प्रस्तुती!

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  6. मेरे आधे से अधिक मित्र दलित हैं. ये अलग बात है कि उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है. पर सामाजिक स्थिति आज भी बहुत अच्छी नहीं. कम से कम गाँव में तो नहीं. हॉस्टल में हम एक ही प्लेट में खाते थे...कभी महसूस ही नहीं हुआ हम और वो अलग हैं. इसका कारण है कि हमारे पिताजी ने हमेशा हमलोगों को इन सब बातों से दूर रखा...उन्होंने हमें मानवता की शिक्षा दी. यही बात कुष्ठ रोगियों के साथ भी थी. हमें बचपन से ये मालूम था कि ये रोग उस प्रकार संक्रामक नहीं है जैसा लोग समझते हैं और इसका इलाज भी है. इसीलिये कभी घृणा नहीं हुई.
    जो लोग भावुक होते हैं, वे अपनी दोस्ती को सामाजिक ऊँच-नीच से ऊपर समझते हैं. मैं ये मानती हूँ कि हमें दलितों को खुद से अलग समझकर सहानुभूति का नहीं, बल्कि दोस्ती का व्यवहार करना चाहिये. आपने दोस्ती की खातिर अपने दलित मित्र के यहाँ कुष्ठरोगी का छुआ खाना खाया. न कि सहानुभूतिवश. मैं आपके इस जज़्बे को सलाम करती हूँ.
    जो लोग इस बात को नहीं समझते, उनसे समझने की आशा करना व्यर्थ है. अगर वो सहानुभूतिवश कभी जाकर दलित के यहाँ खाना खा भी लेंगे तो इसे इन्सानियत नहीं, बल्कि अपनी महानता समझेंगे.

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  7. शरद भाई, आप ने मित्र को दिया वचन तोड़ कर कोई गलती नहीं की और आप का मित्र इस वचनभंग को क्षमा कर ही देगा। आप का यह संस्मरण अद्भुत है। गरीबी की यह हद बहुत कम देखने को मिलती है। हालांकि शायद यह भी हद नहीं है, या कोई हद है ही नहीं।

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  8. बहुत ही प्रेरणादायक प्रसंग....आशा है काफी लोगों की भ्रांतियां दूर होंगी और ऐसा ही कुछ करने को प्रेरित होंगे...

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  9. प्रेरणादायक संस्मरण....बिरले ही होंगे जो ये कर सकें....

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  10. शरद जी बहुत भावप्रवण किस्सा सही अवसर पर सुनाया आपने -मगर मैं भी किस मानसिकता का आदमी हूँ की ऐसी जगहों पर खाना खाने की हिम्मत इसलिए नहीं होती की क्यूं उनकी गरीबीं का आटा गीला करूं -और फिर उन्हें दे क्या सकूंगा? मैं आपने को समर्थ नहीं पाता इसलिए मेरी दुष्ट नैतिकता मुहे हठात रोकती है -काश होता मैं श्रीकृष्ण तो सुदामा के चावल का कुछ प्रतिदान तो करता ?
    इधर राहुल और कांग्रेस ने ऐसी ही शोशेबाजी शुरू की है ..भैया हमशे नहीं हो पाता यह सब ..हाँ उनके साथ तो उठता बैठता हूँ ही -एकाध गुड की डाली खा भी लेता हूँ ....मगर नमक ..न बाबा ना -अपुन की ऐसी औकात नहीं !

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  11. क्या कहूँ बहुत गहरे तक चोट करने वाली पोस्ट है ये...हकीकत यही है की हम अपनी सामाजिक मानसिकता से अभी भी नहीं उबार पाए हैं...

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  12. बहुत मार्मिक पोस्ट है। आपकी मित्रता की भावना सराहनीय है। किन्तु मित्र से पूछे बिना उनको दिया वचन तोड़ना नहीं चाहिए था।
    घुघूती बासूती

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  13. आपके जज़्बे को सलाम । इन्हीं से इंकलाब आता है।

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  14. Hats off to you Sharad ji.

    Arvind ji ki baat se sehmat hun.

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  15. बताईये...बहुत उम्दा पोस्ट!

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  16. शरद जी! आज मेरी नजरों में आपका सम्मान इतना अधिक बढ़ गया कि बता नहीं सकता।

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  17. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  18. @अवधिया जी , नमस्कार ।आप मेरे वरिष्ठ हैं , स्टेट बैंक की नौकरी में भी और ब्लॉगिंग में भी ।
    आपसे मार्गदर्शन मिलता रहे बस यही अपेक्षा है ।
    बहुत बहुत धन्यवाद ।
    कभी दुर्ग मेरे घर अवश्य पधारिये । यहाँ और भी मित्रों से मुलाकात होगी ।

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  19. शरद भाई,
    काश यही सोच हर व्यक्ति की हो जाए...
    कोई ये लेख मायावती को भी पढ़ाए...दलितों की चैंपियन होने का दावा मायावती कितना भी करें लेकिन उनका मिशन अधिक से अधिक पैसा इकट्ठा करना हो गया है...दलितों की हालत यूपी में अब भी बहुत विकट है...इस देश की त्रासदी यही है कि यहां दलितों की बात भी की जाती है तो सिर्फ उनके वोट को ज़ेहन में रखकर...ये कोई नहीं सोचता, सदियों से जिन्हें दबाया जाता रहा, आखिर वो भी हाड-मांस के हमारी तरह ही इनसान है...

    शरद भाई आपके जज़्बे को सलाम...

    जय हिंद...

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  20. BAHUT SATIK BAT


    WAQAY ME

    SHEKHAR KUMAWAT

    http://kavyawani.blogspot.com/

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  21. "आज भी मैं अपने सवर्ण मित्रों के बीच जब वे जाने-अनजाने दलितों का उपहास करते हैं , दलितों का ही पक्ष लेता हूँ और उन मित्रों से कहता हूँ कि जीवन में एक बार अपने सारे राजनीतिक ,सामाजिक , धार्मिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर , सही मन से किसी ग़रीब दलित के घर जाकर उसके घर की रोटी का एक टुकड़ा खाकर देखें और उसके कष्टों का अनुभव करें और इतिहास में उनके साथ जो सलूक हुआ है उसके बारे में जाने .. उनकी सारी धारणायें बदल जायेंगी ।
    मुझे नहीं पता कितने लोग ऐसा कर पायेंगे ??? "
    Aapne aisa kaha aur kiya, jan-na sukhad hai.
    हमें यह मानने में संकोच नहीं होना चाहिए कि आज भी दलितों और हमारी सामाजिक स्थिति में ज़मीन-आसमान का अंतर है। क्या हम खैरलांजी जैसा एक भी उदाहरण बता सकते हैं जो सवर्ण स्त्री के साथ हुआ हो। जबकि दलित स्त्रियों के साथ ऐसा होने की महीनें में एक-दो खबरें आज भीं पढ़ने को मिल जाती हैं।
    Shukriya Sharad Bhai.

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  22. मेरी भी एक मित्र हरिजन थी। मैं अक्‍सर उसके यहाँ जाया करती थी। एक दिन उसके ही नाश्‍ता भी किया और घर आकर अपनी बहन को बताया भी कि आज मैंने उसके यहाँ खाया है। बहन बोली कि कोई बात नहीं, अपना ही होगा। क्‍योंकि वो लोग तो घरों से ही मांगकर ले जाते हैं। लेकिन हमारी दोस्‍ती नहीं टूटी। आज न जाने वो कहाँ है?

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  23. शरद जी ,
    सचमुच एक प्रेरणा दायक प्रसंग और इसे पढ़ कर जरूर हम में से हर किसी के मन पर कुछ असर हुआ है ...कुछ लोग इन सब बातों को अब भी मानते हैं पर आप जैसे लोग भी तो हैं यहाँ पर....धीरे धीरे सब मिटा डालेंगे और एक हो जायेंगे ....:)

    शुभकामनाएं ..:)

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  24. शरद जी ,आप को भी लगेगा कि मैं इतने दिन अब जागी हूं लेकिन आप की इस पोस्ट ने बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर दिया ,जो आप ने किया ये हर किसी के बस की बात नहीं थी ,आज के दौर में दोस्ती का ये रूप भी देखने को मिल सकता है ये बात मन को स्पर्श करती है
    ये आप के लेखन का कमाल है या इसे पढ़ कर उत्पन्न हुए भाव इतने प्रबल हैं ,जो भी है रचना अंतरात्मा को भिगो गई
    आभार

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  25. dil bada dildaro ka sar bada sardaro ka.
    dosi main log pata nahi kiya kiya kar jate hai.

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